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Thursday, October 26, 2017

छठ पर्व पर विशेष :-नर्म और सख़्त कैसे होता है छठ का ठेकुवा और ख़स्ता

महजबीं

नर्म और सख़्त कैसे होता है छठ का ठेकुवा और ख़स्ता

सर्दियों के गुलाबी मौसम में त्योहारों की आमद साथ लाती है मेहमान पकवान शादियों के पैग़ाम। आजकल बाज़ार में त्योहार से मुतालिक हर चीज़ बाआसानी से फराहम है तरह-तरह के तोहफे मिठाइयाँ सजावट के सामान होली की गुज़िया तिल के लड्डू रेडीमेड रंगोली इत्यादि। बाज़ार और टेक्नोलॉजी ने बहुत काम आसान कर दिया अब हर चीज़ हर जगह मिलती है और घर में बनने वाली चीज़ें भी बाज़ार में मिलती है जैसे अब सत्तू तीसी धान बाजरा मड़वा मकई का आटा चूरा (पोहा, चिड़वा ) लाई के लड्डू तिल के लड्डू होली की गुज़िया शरीफा टापलेमुन झिंगा मछली.... बाज़ार ने हमारी दौड़ धूप महनत कम कर दी है इसमें कोई शक़ नहीं घर बैठे इंट्रनेट पर अॉडर देकर कुछ भी मंगा लिजिए। मगर इस सुविधा में चकाचौंध में कहीं कुछ पिछे छूट गया है, संवेदना दिनो - दिन मिटती जा रही है, अब लोगों के दिलों में अहसास नहीं रहे हैं इनकी जगह अॉपचारिकता (खानापूर्ति ) ने ले ली है, टेलीफोन मोबाइल के ज़रिए अब कभी भी किसी से बात करना कितना आसान हो गया है मगर बात करने में वो पहले वाली बेसब्री इंतजार ललक मुहब्बत नहीं रही। अब कोई ज़ुदा होता है रुख़सत होता है तो अलविदा में नम आँखें उतनी नम नहीं होती दिल में चुभन नहीं होती, क्योंकि अब महिनों सालों कोई किसी से बात करने को नहीं तरसता, अब कोई हालचाल गुफ्तगू के लिए ख़तूत के मोहताज नहीं, फोन पर व्हाट्स एप्प पर रोज़ बात हो जाती है। अब तो आदमी मर जाता है तो उतना दु:ख नहीं होता उसके चले जाने का, उधर जनाज़ा उठा इधर मिंटो में सब नॉर्मल हो जाते हैं।

मैं अक्सर अपने प्रेज़ेंट को अपने पास्ट से नापती - तोलती रहती हूँ देखती रहती हूँ क्या खो दिया है क्या पा लिया है कुछ नया - नया पाकर खुशी और आराम मिलता है मगर माज़ी की कुछ बातें नहीं भुलती वो अभी भी खींच लेती हैं अपनी तरफ़ जैसे कि नानी के हाथों भेजी गई वो मोटरी जिसमें तीसी सत्तु चूरा लाई के लड्डू धान मड़वा का आटा ख़स्ता झिंगा मछली होती थी उस मोटरी का हम बेसब्री से इंतजार किया करते थे क्योंकि यह सब चीज़ें उन दिनों दिल्ली में नहीं मिलती थी नानी आती थी तो लाती थी या गाँव से आने वाले लोगों के हाथ भिजवाती थी, अब यह चीज़ें दिल्ली की हर गली में दुकानों पर मिल जाती हैं मगर मुझे वो मोटरी अब भी याद आती है क्योंकि उसमें सामान के साथ - साथ नानी का ख़त भी आता था और उनकी मुहब्बत भी जो अब किसी बाज़ार में नहीं मिलते।

जब कोई गाँव से आता - जाता है तो सफर के लिए ख़स्ता बनाकर दिया जाता है कितना टेस्टी होता है ख़स्ता मगर अब यह रिवाज़ भी कहीं छूट रहा है,अब कहीं नहीं मिलता ख़स्ता खाने को , ख़स्ता और छट पर्व पर बनने वाला ठेकुवा और बरेलवी मुसलमानों के कुंडा में बनने वाले कुंड्डे का स्वाद बिल्कुल एक जैसा है, इसलिए कहीं से कोई बरेलवी मुसलमान कुंड्डे दे दे कुंड्डो के दिनों में तो मैं देवबंदी मुसलमान हूँ मगर कुंड्डे लेने से मना नहीं करती, क्योंकि मैं बरेलवी देबंदी के तसद्दुद में नहीं पड़ती कुंड्डो को अल्लाह का रिज़्क़ समझकर खा जाती हूँ, क्योंकि उसमें मुझे ख़स्ता का स्वाद मिलता है, ऐसे ही मुझे छट पूजा का भी इंतज़ार रहता है क्योंकि उसमें बिहार के हिन्दू पड़ोसियों के यहाँ से ठेकुवा आता है प्रसाद में जिसे मैं आते ही चट कर जाती हूँ, क्योंकि मैं ठेकुवा और ख़स्ता में अंतर कर ही नहीं पाती बिल्कुल सेम टेस्ट और रेसिपी है दोनों की बस शक्लें मुख़तलिफ़ हैं।

जब हम छोटे थे तो ख़स्ता खाते थे कहीं से आता था और छट पूजा के ठेकुए, कहीं से तो नर्म - नर्म आते थे और कहीं से बहुत सख़्त जिन्हें खाना बहुत मुश्किल होता है, मैं अब्बा से पूछती "अब्बा ये इतने सख़्त क्यों हैं खाते-खाते दाँत दु:ख गए"अब्बा क्या ये नरम नहीं बन सकते जैसे फलां-फलां के यहाँ बनते हैं, अब्बा कहते "हां नरम भी बन सकते हैं अगर इनमें घी थोड़ा और पड़ जाए, जितना मीठा गेरो उतना मीठा और जितना घी गेरो उतना नरम "तब समझ आया लॉजिक कि किसी - किसी के यहाँ के ख़स्ता ठेकुए नरम क्यों होते हैं और किसी - किसी के यहाँ के सख़्त क्यों, एक दिन अब्बा से कहा" अब्बा ये लोग ख़स्ता और ठेकुवा बनाते समय अच्छी तरह घी क्यों नहीं डालते? क्यों सख़्त बनाकर रिज़्क़ का सत्यानाश करते हैं" अब्बा ने कहा "बाबु रिज़्क़ ऐसी चीज़ है जिसका कोई जानबूझकर कभी सत्यानाश नहीं करता न बर्बाद, यह ऐसी नियामत है जिसकी क़द्र सबको है, असलियत में सबकुछ आदमी की आमदनी और हैसियत पर मुनहसर(निर्भर ) है, घी कितना मंहगा आता है ग़रीब आदमी अपने हस्बेमाअमूल नहीं अपनी आमदनी और हैसियत के मुताबिक ही तो इस्तेमाल करेगा, ये पकवान ख़स्ता और ठेकुवा आमदनी तय करती है कितने सख़्त बनेंगे और कितने नरम"।

अब्बा की वो बात मैं आजतक नहीं भूली और अब तो और भी याद आती है जब घरारी का सारा दारोमदार ख़ुद संभालना पड़ता है, एक रोज़ कुछ साल पहले मेरे एक क़रीबी ने अपनी राय दी थी गृहस्थी घर परिवार के संदर्भ में कि "जितने ज़्यादा अपने परिवार वालों पर पैसे ख़र्च किये जाएं जितना उन्हें माना जाए उतनी ही उनसे मुहब्बत मिलेगी" उसने भी समझाते समय मिसाल पेश की थी कि "जितना गुड़ डालो उतना मीठा होता है ठीक वैसे ही परिवार के सदस्यों को जितना दो- लो मानो उतनी ही मुहब्बत" । मैं एकटक सुनती रही बाद में सोचा कि क्या मुहब्बत भी आदमी की आमदनी और हैसियत से मिलती है? पैसे खर्च करने से मिलती है, अगर पैसे से मिलती है तो फिर जो मिलती है वो मुहब्बत कहाँ है? नहीं मुहब्बत पैसे से कभी नहीं मिलती ये दौलत तो गॉड गिफ्टिड है जिसे कभी कोई ख़रीद - फ़रोग नहीं कर सकता, पैसे से शराफत से हम किसी की तवक्कात ख़ैरख़्वाही इज्ज़त पा सकते हैं मगर मुहब्बत नहीं, ठेकुवा और ख़स्ता नरम कर सकते हैं मगर किसी का दिल नहीं, सामान इंसान में फ़र्क़ है दोनों ही बिकते हैं बाज़ार में मगर दिल नहीं, मुहब्बत नहीं अगर ऐसा होता तो कभी कोई शख़्स एकतरफा मुहब्बत में कभी मज़बूर होकर लाचार होकर मुहब्बत पाने के लिए तरसता नहीं, कोई यतीम माँ-बाप की मुहब्बत को नहीं तरसता, आज तक कोई साइंस दा मुहब्बत भरा दिल इज़ाद कर सका है? किसी मुहब्बत के लिए तरसते इंसान के लिए मुहब्बत करने वाला इंसान बनाकर साइंटिस्ट्स ने बाज़ार मोल में भेजा है, नहीं क्योंकि यह सिर्फ इश्वर के बस की बात है इश्वर ही मुहब्बत का तोहफा देता है और सिर्फ मुहब्बत ही इश्वर तक ले जाती है, पाखंड कट्टरता नफरत ढकोसला नहीं।

मुहब्बत का तोहफा सबको मिले माँ-बाप दोस्त हमसफर की मुहब्बत इसी कामना के साथ छट पर्व की शुभकामनाएं।

मेहजबीं

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