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Sunday, January 27, 2019

बॉलीवुड में ऐतिहासिक ,राजनीतिक, वैचारिक मतभेद पर आधारित दो तीन फाड़

Mahjabeen

बॉलीवुड में भी ऐतिहासिक राजनीतिक वैचारिक मतभेद पर आधारित दो तीन फाड़ दिखाई देने लगे हैं ।एक गढ़ वो है जो सचमुच हक़ीक़त दिखाता है सच के साथ है ...सामाजिक राजनीतिक आर्थिक सांस्कृतिक  स्थतियों को समस्याओं को सही रूप में सामने रखता है ...मगर मीडिया ऐसे ईमानदार निर्देशकों कलाकारों की पब्लिसिटी तो दूर ज़िक्र भी नहीं करता... कुछ अच्छे अख़बार पत्रिका ही उनके बारे में ज़िक्र करते हैं... लोगों तक ये फिल्में नहीं पंहुचती ठीक से....वहीं मीडिया ऐक्शन ड्रामा होरर कमर्शियल  एन्टरटेनमेंट फिल्मों की और झूठ परोपेगैंडा पर आधारित मूवी का खूब प्रचार करती है... बॉलीवुड में फिल्में बनाने वाला दूसरा गढ़ है इतिहास से छेड़छाड़ करने वाला जो ग़लत तरीक़े से इतिहास को नफरत प्रोपेगैंडा का तड़का लगाकर दर्शकों के सामने रखता है झूठ और परोपेगैंडा पर केन्द्रित रहता है सत्ता की मानसिकता स्थिति उनकी फिल्मों में देखने को मिलती है... मीडिया भी इन्हीं के साथ है .....कुछ ऐसे निर्देशक हैं कि इतिहास को वैसे ही रखते हैं जैसे था उसमें कुछ रद्दोबदल नहीं करते ना आधुनिक संदर्भ में दिखाते हैं प्रगतिशील भी नहीं बनने देते पात्रों को ...मगर ये उनसे फिर भी बेहतर हैं जो सत्ता के लाभ के लिए इतिहास को नफरत ग़ैरबराबरी हिन्दू मुस्लिम के पैमाने में रखकर दिखाते हैं.... इन नफरत फैलाने वाले निर्देशकों और हिन्दू मुस्लिम में अलेहदगी करने वालों निर्देशकों से बेहतर कमर्शियल एन्टरटेनमेंट फिल्में बनाने वाले हैं पैसा कमाते हैं नफरत तो नहीं फैलाते ...और आजकल तो कुछ फिल्मों को देखकर ऐसा लगता है जैसे मीडिया की तरह बॉलीवुड के कुछ निर्देशक भी सत्ता के सामने बिछने के लिए तैयार हैं एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर फिल्म बनाई है सच्चाई को नदारद करके और बाला साहब ठाकरे के जीवन पर आधारित फिल्म बन रही है उसमें पता नहीं क्या दिखाएंगे ...इंदिरा गाँधी जी पर भी बनाई थी अभी कुछ समय पहले ....ऐतिहासिक राजनीतिक सामाजिक स्थिति को दिखाएं ये निर्देशक मगर निष्पक्ष होकर।

अपने होंठों पर सजाना चाहता हूँ
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ 

कोई आँसू तेरे दामन पर गिराकर 
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ 

थक गया मैं करते-करते याद तुझको 
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ

छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा 
रोशनी हो, घर जलाना चाहता हूँ 

आख़री हिचकी तेरे ज़ानों पे आये 
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ

राहत इंदौरी

Saturday, January 26, 2019

बहारें फिर भी आयेंगी

बहारें फ़िर भी आएंगी(1966) धर्मेंद्र माला सिन्हा तनूजा रहमान जॉनी वॉकर की प्रसिद्ध ट्रेंगल लव स्टोरी फिल्म थी....क्लासिकल मूवी। मगर ग़ौर किया जाए तो एक बहुत ही अच्छा विषय फिल्म में है पत्रकारिता प्रकाशन संपादन की दुनिया से जुड़ा।

फिल्म शुरु होती है जागृति अख़बार के दफ्तर में बोर्ड मीटिंग से....जहाँ अख़बार की मालिक चेयरपर्सन माला सिन्हा (अनिता) जी भी हैं और अख़बार के संपादक दास जी और वो पूंजीपति वर्ग भी जिन्होंने अख़बार के भूतपूर्व मालिक की मृत्यु के बाद उनकी बेटी अनीता को अख़बार फिर से शुरु करने के लिए क़र्ज़ दिया है और अख़बार के शेयर ख़रीद रखें हैं।मीटिंग एक ख़बर के उपलक्ष्य में रखी गई है....अख़बार में एक रिपोर्टर की हैसियत से काम करने वाले पत्रकार मिस्टर गुप्ता(जिसकी भूमिका में धर्मेंद्र जी हैं) ने संपादक की बिना इजाज़त के खाद्दानों के मालिकों के खिलाफ़ ख़बर छपवा दी है... खाद्दानों के मालिक यही पूंजीपति हैं जो मीटिंग में बैठे हैं। और ये पूंजपति संवेदना से ख़ाली हैं मुनाफा कमाना ही इनका उद्देश्य है ...वो अख़बार के मालिक पर दबाव डालते हैं कि उनके खिलाफ़ अख़बार कोई ख़बर ना छापे ...वो कहते हैं कि "हमने अख़बार को क़र्ज़ दिया है उसके शेयर ख़रीदें हैं फिर हमारे ही ख़िलाफ़ अख़बार ख़बर कैसे छाप  सकता है"।
मीटिंग के बाद अख़बार की मालिक अनीता और पत्रकार मिस्टर गुप्ता के बीच बहस होती है। पत्रकार से सवाल होता है कि "अख़बार का नियम क्यों तोड़ा गया है ? बग़ैर संपादक की इजाज़त के ख़बर क्यों छपवाई ?" पत्रकार ज्वाब देता है कि ख़बर अहम थी संपादक पूंजीपतियों से मिले हुए हैं लाखों रुपए उनसे लेते हैं वो ये ख़बर नहीं प्रकाशित करते...खाद्दानों के मालिक अवैध तरीक़े से खाद्दानों की खुदवाई करवाते हैं जो मज़दूरों के झोंपड़ों घरों को खोकला कर रही हैं.. मज़दूरों के घर ज़ल्द ही गिर जाएंगे अगर तुरंत खाद्दानों की अवैध खुदाई को रोका ना गया... आप अख़बार की मालिक हैं ऐसे में आपका निर्णय बहुत अहम है अख़बार के ज़रिए सच को सामने लाने से मज़दूरों के घर गिरने से और उन्हें बेमौत मरने से बचाया जा सकता है"। मगर अख़बार की माल्किन मज़बूर है उसने पूंजीपतियों से क़र्ज़ ले रखा है.. वो पत्रकार को निकाल देती है मज़बूरन और पत्रकार सच्चाई के आगे झुकता नहीं वो ये कहकर "बदल जाए अगर माली चमन होता नहीं ख़ाली बहारें फिर भी आती हैं फिर भी आएंगी" वहाँ से चला जाता है। जिसका नताइज़ अच्छा नहीं होता पूंजीपतियों को ग़ैरक़ानूनी कामों में फ़रोग़ मिलता है वो अवैध तरीक़ों से खाद्दानों को खोदते हैं और मज़दूरों के घर गिर जाते हैं... रातों-रात हज़ारों मज़दूर बेघर हो जाते हैं 135 मज़दूर जान से चले जाते हैं। इस घटना से जागृति अख़बार की माल्किन अनीता को बहुत दु:ख होता है... क्योंकि वो एक संवेदनशील व्यक्तित्व रखतीं हैं ...इस घटना के बाद वो अख़बार के संपादक दास को हटा कर मिस्टर गुप्ता जो पहले उनके अख़बार में रिपोर्टर की हैसियत से काम करते थे फिर से उन्हें संपादक की हैसियत से काम देती हैं.... और निर्णय करती हैं कि उनके बाबा ने जो कभी अख़बार की शुरुआत "सत्य की जीत" उद्देश्य से रखी थी उस उद्देश्य पर ही अख़बार आगे निकलेगा चाहे जैसी भी सामाजिक राजनीतिक आर्थिक स्थिति हो....किसी के दबाव में नहीं रहेंगी।
और फिर अख़बार की माल्किन अनीता और अख़बार के संपादक मिस्टर गुप्ता सत्य की जीत को आधार बनाकर ही काम करते हैं।फिल्म में भारत चीन की लड़ाई का भी ज़िक्र है पूंजपति वर्ग युद्ध की स्थिति को भी अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करना चाहता है देश से देशवासियों से उन्हें संवेदना नहीं है....जागृत अख़बार का संपादक इस स्थिति की जाँच के लिए हर ख़बर से अपडेट रहता है यहाँ तक की युद्ध स्थल पर भी जान की परवाह न कर जाता है और अख़बार में युद्ध की स्थिति राजनीति पक्ष पूंजपति वर्ग की सच्चाई को ईमानदारी से सामने रखने की कोशिश करता है। अब ऐसे में पूंजपति वर्ग अख़बार की मालिक और चेयरपर्सन अनीता पर बोर्ड मीटिंग में दबाव बनाता है कि अख़बार में उनके ख़िलाफ़ ख़बरें ना प्रकाशित की जाएं और संपादक को बदल दिया जाए।वो इसके लिए अख़बार की चेयरपर्सन पर क़र्ज़ और शेयर का हवाला देकर अख़बार बंद होने का हवाला देकर दबाव बनाते हैं।मगर अख़बार की चेयरपर्सन उनके दबाव में नहीं आती वो साफ साफ कह देती हैं कि अख़बार अपने सत्य की जीत उद्देश्य पर ही प्रकाशित होगा। वो मीटिंग में सच्चाई पर कायम रहतीं हैं मगर स्थिति उनके वीपरीत है क़र्ज़ चुकाने की रक़म उनके पास नहीं इसलिए उनके समक्ष गंभीर स्थिति है जिससे सामना करते हुए वो ज़हनी तौर पर परेशान होती हैं। अख़बार के संपादक भी उनकी स्थिति को समझते हैं और उनकी परेशानी को दूर करने के लिए वो इस्तीफा देने का फैसला करते हैं क्योंकि वो अख़बार की चेयरपर्सन अनीता का बहुत सम्मान करते हैं।
फिल्म में इन सब स्थितियों के साथ साथ ट्रेंगल लवस्टोरी भी चलती है अख़बार के संपादक अख़बार की चेयरपर्सन अनीता की सच्चाई ईमानदारी सादगी जिम्मेदारी से युक्त व्यक्तित्व से प्रभावित होते हैं इसलिए वो उनका बहुत सम्मान करते हैं....मगर अनीता उनकी ईमानदारी और महनत सच्चाई से प्रभावित होकर उनसे मुहब्बत करने लगतीं हैं जिसकी हक़ीक़त संपादक को नहीं वो समझ ही नहीं पाते फिल्म के अंत तक....फिल्म के संपादक अनीता की छोटी बहन सुनीता(तनूजा) जो उन्हें ट्रेन के सफ़र में मिलती हैं ...वो उसकी मासूमियत से प्रभावित होकर उससे मुहब्बत करते हैं और सुनीता भी उनसे मुहब्बत करती है। जब सुनीता की बहन अनीता जो अख़बार की चेयरपर्सन हैं इस सच्चाई से वाक़िफ़ होती हैं कि उनकी छोटी बहन और संपादक गुप्ता एक-दूसरे को चाहते हैं...तब वो अपने जज़्बात पर काबू करती है और अपनी मुहब्बत को त्याग कर देती है छुपा लेती है अपनी बहन की खातिर...एक तरफ़ तो उनकी एक तरफ़ा नाकाम मुहब्बत दूसरी तरफ़ अख़बार बंद होने की चिंता दोनों स्थितियों का उनके ज़हन पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
अनीता की शख़्सियत से सब प्रभावित हैं उनकी ईमानदारी सच्चाई दृढ़ निश्चय नरम दिल से अख़बार के संपादक भी और वो भी उनका सम्मान करते हैं...मगर कोई उनकी प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ को अलग करके उन्हें नहीं देखता...उनके आदर्शवादी जिम्मेदार चरित्र में एक लड़की को उसकी ज़ाती ज़िन्दगी की ख़्वाहिश को नहीं देखता... उसकी तन्हा ज़िन्दगी तन्हा ज़िन्दगी के सफ़र को कोई नहीं देखता ...सब उसे सिर्फ़ सम्मान ही देते हैं जब्कि वो भी एक इंसान है इंसान का जिस्म रखती है दिलोज़हन रखती है ख़्वाहिश रखती है...जो बाबा के आदर्शों को बहन की अख़बार की जिम्मेदारियों को निभाते हुए दब गए हैं.. मगर महसूस तो होते हैं ...ठीक यही चरित्र वहीदा रहमान जी ने अपनी फिल्म ख़ामोशी में नर्स राधा के किरदार में निभाया है....दोनों अभिनेत्रियों ने अख़बार की चेयरपर्सन अनीता और हॉस्पिटल की नर्स राधा का किरदार बहुत संवेदनशील तरीक़े से किरदार में ढलकर निभाया है ...वहीदा जी और माला जी ने।
इन सब स्थिति में अनीता सिर्फ़ बाबा की तस्वीर है जिससे वो सब मुश्क़िलात ब्यान करती है तन्हा।
उधर जब सुनीता को यह अहसास होता है कि उसकी बहन अनीता भी संपादक गुप्ता को मुहब्बत करती है तब वो भी अपनी बहन की खातिर अपनी मुहब्बत की क़ुर्बानी देने के लिए किसी दूसरे शख़्स से शादी करने के लिए घर छोड़कर चली जाती है.....इस बात का भी अनीता के दिमाग़ पर बहुत बुरा असर होता है... और वो अपने बाबा के पुराने अख़बार के दफ्तर में उनकी तस्वीर से बातें करने चली जाती है.....जैसे वो अक्सर तन्हाई में अपने बाबा की तस्वीर से बातें करके अपना ज़ी हल्का किया करती है आज भी आई है... परेशानी में चिंता में अपने बाबा से बातें करती है ...वो नहीं चाहती की उसकी बहन किसी ऐसे शख़्स से शादी करके अपनी ज़िंदगी बर्बाद करे जो उसके लायक नहीं है ...और नहीं चाहती की अख़बार बंद हो ....तस्वीर के सामने बोलते बोलते वो निढाल हो जाती है गिर जाती है उसे दिखाई देना भी बंद हो जाता है आवाज़ भी नहीं पहचान पाती...तभी उसे ढुंढते हुए अख़बार के संपादक उसकी बहन और उसके एक मित्र(रहमान उनके मित्र की भूमिका में हैं )आते हैं..मगर अनीता जी उन्हें नहीं पहचानती ठीक से की कौन शख़्स कौन है क्योंकि वो देख नहीं पा रही आवाज़ भी नहीं पहचान पा रही...और अपने अंतिम समय में वो अख़बार के संपादक को मित्र समझकर कहती हैं कि "मैंने अपने बाबा का पुराना अख़बार का दफ्तर गिर्वी नहीं रखा था आप यहाँ बाबा के पुराने दफ्तर में फिर से अख़बार नए सिरे से शुरू करें और गुप्ता जी के साथ मिलकर शुरु करें क्योंकि वही हैं जो बाबा के आदर्श सच्चाई की जीत  को उद्देश्य बनाकर अख़बार को बरक़रार रख सकते हैं और उनसे ये मत बताईयेगा कि मैं भी उनसे मुहब्बत करती हूँ.... मेरे बाद अख़बार यहीं से दुबारा शुरु करें ..."बदल जाए अगर माली तो चमन होता नहीं ख़ाली बहारें फिर भी आतीं हैं"यहीं अनीता जी अंतिम वाक्य कहकर मर जाती हैं फिल्म समाप्त हो जाती है।
फिल्म के सभी गीत बहुत ख़ूबसूरत हैं लिरिक्स की दृष्टि से भी और गायक-गायिका संगीतकार की दृष्टि से भी।
फिल्म का मशहूर गीत जो मुहम्मद रफ़ी साहब ने गया है कौन भूल सकता है आज भी जंवा दिलों की ज़बान पर बरकरार है..."आपके हंसीन रुख़ पे आज नया नया नूर है मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कुसूर है"।
और महेंद्र कपूर जी का गीत जिसे राजेंद्र कृष्ण जी ने लिखा है वो भी बेहद ख़ूबसूरत है ज़िन्दगी की हक़ीक़त से जुड़ा हुआ है फिल्म का सार भी इसी गीत में है।
"बदल जाए अगर माली, चमन होता नहीं ख़ाली
बहारें फिर भी आती हैं, बहारें फिर भी आयेंगी
थकन कैसी, घुटन कैसी
चल अपनी धून में दीवाने खिला ले फूल काटों में
सजा ले अपने वीरानें
हवाएं आग भड़काएं फ़ज़ाएं जहर बरसाएं
बहारें फिर भी आती हैं, बहारें फिर भी आयेंगी
अंधेरे क्या, उजाले क्या, ना ये अपने ना वो अपने
तेरे काम आयेंगे प्यारे, तेरे अरमां, तेरे सपनें
जमाना तुझ से हो बरहम न आये राहभर मौसम
बहारें फिर भी आती हैं, बहारें फिर भी आयेंगी।"

आज भी भारत में ऐसी फिल्मों की ज़रूरत है जो ज़िन्दगी की हक़ीक़त को सामने रखे अख़बार पत्रिकाओं चैनलों के प्रकाशकों संपादकों मालिकों को प्रेरित कर सके सच के साथ खड़े होकर चलने के लिए...भारतीय पत्रकारिता विश्व स्तर पर सौवें स्थान से भी निचे गिर गई है ...लोकतंत्र के चारों स्तंभ ख़तरे में हैं जिनमें से एक मिडिया है। आजकल कुछ कलात्मक फिल्मों को छोड़कर ज़्यादातर फिल्में और उनके गीत संगीत बिल्कुल बेमायने हैं ज़िन्दगी की आधी से ज़्यादा हक़ीक़त से कहीं दूर। फिल्म बहारें फिर भी आएंगी प्रासंगिक है ...काश की आजकल की नफरत बिरादरी क्षेत्र के नाम पर होने वाली गंदी राजनीति के दौर में ...ख़राब सामाजिक राजनीतिक आर्थिक स्थिति में जब पूंजपति वर्ग की ख़ैरख़्वाह मिडिया है सत्ता है...पत्रकार संपादक प्रकाशक उस फिल्म के किरदारों को अपने जीवन में उतार सकते।
-मेहजबीं

Tuesday, January 22, 2019

प्रधानमंत्री आवास योजना के सभी किश्तों का भुगतान 26 जनवरी के पहले हर हाल में कर दें :- डी एम

सीतामढ़ी।प्रधानमंत्री आवास योजना अंतर्गत सभी किश्तों को भुगतान 26 जनवरी के पहले हर हाल में कर दे।उक्त बातें डीएम डॉ रणजीत कुमार सिंह ने समाहरणालय सभाकक्ष में आयोजित जिला समन्यवय समिति की बैठक में उपस्थित सभी बीडीओ को कही।उन्होंने कहा कि इसमें लापरवाही करने वाले पर जबाबदेही तय कर करवाई की जाएगी।उन्होंने कहा कि लंबित एफटीओ का निष्पादन 24 घंटे के अंदर करवाना सुनिश्चित करवाये,अन्यथा संबंधित डेटा इन्ट्री ऑपरेटर पर तो निष्काशन की करवाई तो होगी ही ,वही संबंधित बीडीओ पर भी करवाई होगी।डीएम ने परसौनी,परिहार, सूप्पी आदि के बीडीओ को आवास योजना में निम्न प्रदर्शन को लेकर फटकार भी लगाई।डीएम ने उपस्थित सभी सीओ को निर्देश दिया कि 25 जनवरी तक वासगीत पर्चा के चिन्हित सभी लाभुको को वितरण हेतू सभी आवश्यक तैयारी कर ले।डीएम ने सभी अंचलाधिकारियों को निर्देश दिया कि पंचायत सरकार भवन,पावर सब स्टेशन,अंचल कार्यालय,सभी प्रखंडों में आधुनिक बस स्टैंड,आंगनवाड़ी केंद्र आदि  के लिए हरहाल में ससमय भूमि का चयन कर प्रस्ताव भेजे ताकि सरकार की सरकार की इन महत्वपूर्ण योजनाओ को समय जमीन पर उतारा जा सके।उक्त बैठक में एडीएम ब्रजकिशोर सदानन्द,जिला पंचायती राज पदाधिकारी आलोक कुमार,सहायक निर्देशक,सामाजिक सुरक्षा सहित सभी वरीय अधिकारी,सभी बीडीओ,सभी सीओ आदि उपस्थित थे।

Monday, January 21, 2019

नील कमल की तुलना में वहीदा रहमान जी की फिल्म काला बाज़ार कहीं बेहतर फिल्म है !!

!! नील कमल की तुलना में वहीदा रहमान जी की फिल्म काला बाज़ार कहीं बेहतर फिल्म है !!

नील कमल अच्छी अभिनेत्री की घटिया फिल्म, काला बाज़ार अच्छी अभिनेत्री की बहुत-बहुत अच्छी फिल्म, वहीदा रहमान बेहतरीन अभिनेत्री हैं सभी दृष्टि से, सुंदरता की दृष्टि से, अभिनय की दृष्टि से, नृत्य की दृष्टि से भी।

नील कमल फिल्म में सब एक से बढ़कर एक शानदार कलाकार हैं बलराज साहनी, वहीदा रहमान, राजकुमार, मनोज कुमार, ललिता पवार, मेहमूद उस फिल्म का संगीत भी बहुत उम्दा है "बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले"मुहम्मद रफ़ी साहब का गाया एक अहसास मंद बेहतरीन गीत जो आज भी प्रासंगिक है होंठों पर शादी-ब्याह के मौक़े पर आ ही जाता है। मगर फिल्म की कहानी अंधविश्वास के धरातल पर बनी है पहला जन्म दूसरा जन्म पुनर्जन्म इत्यादि, सास ननद का जो जलने - फुकने वाला मियां बीवी में दरार पैदा करने वाला किरदार दिखाया गया है वह कुछ हद तक ठीक है स्वभाविक है, अक्सर घरों में औरतें सास - बहू ननद - भाभी देवरानी-जेठानी के रूप में खलनायिका होती हैं, वहीदा रहमान की सास - ननद नन्दोई तक कहानी और उनके किरदार कुछ समझ में आते हैं हजम होते हैं ।

मनोज कुमार भी राम की तरह भड़कावे में आकर, अपनी पत्नी के चरित्र पर शक़ करके त्याग देते हैं और हिरोइन भी इस अपमान का विरोध न कर ऐसे शक़ करने वाले कान के कच्चे पति को दुबारा पाने की कामना किये हुए, सीता मइया  की तरह साधू महाराज की शरण में भजन कीर्तन करने चली जाती है। तीनों हिरो - हिरोइन के किरदार कोई प्रगतिशील आधुनिक विचारक आदर्शवादी व्यक्तित्व के नहीं हैं।

फिल्म के हिरो राजकुमार पिछले जन्म के प्रेमी का किरदार निभा रहे हैं मर गए हैं, और मरने के बाद अपनी मरी हुई प्रेमिका जो दूसरा जन्म ले चुकी है उसे गीत गा - गा कर पुकारते हैं संपने में आते हैं, और हिरोइन भी पिछले जन्म के प्रेमी की पुकार सुनकर नींद में उठकर चल देती है। यह बात हजम नहीं होती!! मरने के बाद आदमी मिट्टी का राख का ढेर होता है उसमें फिर कोई ताक़त नहीं, न वो खा - पी सकता है, चल सकता है उठ बैठ सकता है गाना भी नहीं गा सकता, बुद्धि और भावना प्रेम घृणा कोई अहसास भी उसमें नहीं रहता, हिरोइन को नींद में चलने की बीमारी है तो साइकेटरिस क्यों नहीं है फिल्म में? नींद में चलना बीमारी है आत्मा की पुकार नहीं, आत्मा की आवाज़ होती ही नहीं जिसे सुनकर कोई ज़िंदा आदमी उसे फॉलो करे, इस तरह की बातें अंधविश्वास पर आधारित हैं मिथक हैं जिसका सहारा अक्सर फिलमों में लिया जाता है, और तीन घंटे तक दर्शकों को बेवकूफ़ बनाया जाता है उन्हें अंधविश्वास मिथक की ओर धकेला जाता है, ऐसे विषय पर बहुत फिल्में बनी हेमामालिनी की 'क़ुदरत' श्री देवी की 'बंजारन' मधुबाला की महल, फागुन दिलीप कुमार वैजयंती माला की 'मधुमती' जयपर्दा की 'माँ' फिल्म, अफसोस अभी भी ऐसी फिल्में बनती हैं विद्या बालन की फिल्म 'भूलभुलैया' ऐसी ही पुनर्जन्म आत्मा - वात्मा की नौटंकी पर आधारित सुपरहिट फिल्में हैं मनोरंजन ब्लॉकबस्टर के लिए दर्शकों को कुछ भी दिखाया जाता  है।

मैंने वहीदा रहमान जी की दूसरी फिल्म काला बाज़ार का ज़िक्र किया जो बहुत अच्छे विषय पर आधारित है सत्य - असत्य काला बाज़ार पर आधारित, स्वतंत्रता के बाद भारत में जो ग़रीबी, भुखमरी, बेरोजगारी जनसंख्या जैसी समस्याएं उत्पन्न हुईं, और उन्हीं समस्याओं के कारण भ्रष्टाचार झूट मारपीट हत्या काला बाज़ार जैसी समस्याएं उत्पन्न हुईं जिसका यथार्थ और सजीव चित्रण फिल्म काला बाज़ार में दिखाया गया है, कैसे कोई ग़रीब बेरोज़गार शख़्स मज़बूरन स्थिति के सामने झुक जाता है, और काला बाज़ार का हिस्सा बन जाता है। जायज़ क्या है नाजायज़ क्या है हराम रोज़ी क्या है हलाल रोज़ी क्या है इसका ज्ञान फिल्म कराती है अपने पात्रों के माध्यम से, और हलाल हराम पैसे का क्या अंत होता है अंजाम होता है यही सब काला बाज़ार फिल्म में शुरू से अंत तक चलता रहता है।

इस फिल्म में सबसे रोचक और दिलचस्प किरदार है फिल्म की हीरोइन वहीदा रहमान का, जो फिल्म में किसी सुंदर स्त्री के रूप में नहीं हैं जैसा कि हर फिल्म में होता है हिरोइन बहुत सुंदर होती है, उसकी सुंदरता का नखशिख वर्णन हिरो गा - गा कर करता रहता है, "" चौदहवीं का चाँद हो"  "कश्मीर की कली" फूलों सा चेहरा" "नर्गिस - ए- मस्ताना" इत्यादि- इत्यादि, न ही रंभा मेनका ऊरवशी की तरह सुंदर है हिरो के चारों तरफ गीत गाती नाचती फिरती है। अधिकतर हर फिल्म में हिरोइन को सुंदर और कहानी को आगे बढ़ाने रोचक बनाने रोमांटिक बनाने के लिए लिया जाता है, एक शो पीस की तरह, वही जकड़ी मानसिकता सामंती व्यवस्था की तरह त्याग घरेलू महिला, हिरो के साथ घूमना मटकना ठुमके लगाना दो चार गानों में हिरोइन का रोल ख़त्म बस यहीं तक सीमित। बहुत कम फिल्में हैं जिनमें हिरोइन प्रगतिशील महिला की तरह, विचारक,, बुद्धिजीवी, मार्गदर्शक की तरह,, सरवाइवर की तरह दिखाई जाती हैं।

फिल्म काला बाज़ार में वहीदा रहमान किसी सुंदरता की मूर्ति की तरह नहीं, बल्कि एक शिक्षित विचारक मार्गदर्शक के रूप में हैं, जो अपने फैसले ख़ुद करती है।हिरोइन की ऐंट्री किसी हूरपरी की तरह नहीं बल्कि सिनेमा घर के बाहर ब्लेक में ख़रीदी टिकट फाड़कर होती है, हिरो - हिरोइन के बीच प्रेम की बुनियाद सुंदरता धन - दौलत रुपये पैसे नहीं,  संवेदना विचार दृष्टिकोण मार्गदर्शन के आधार पर है । फिल्म में हिरो  हिरोइन की सुंदरता पर मोहित नहीं उसके विचारों पर होता है, वह उसे भोग की वस्तु के  रूप में नहीं देखता, न ही उसे अपनी ज़रूरत पूरा करने के सामान के रूप में अपनाना चाहता है, बल्कि एक मार्गदर्शक के रूप में उसे अपना जीवन साथी बनाना चाहता है, बिल्कुल फिल्म साथ-साथ के हिरो फ़ारूख़ शैख़ की तरह है, और वहीदा जी भी दीप्ति नवल की तरह।

""तुमको देखा तो ये ख़्याल आया ज़िंदगी धूप तुम घना साया,तुम चले जाओगे तो सोचेंगे हमने क्या खोया हमने क्या पाया "

फिल्म का हिरो कम पढ़ा - लिखा था सिर्फ़ आठवीं कक्षा तक मगर पुरुषवादी मानसिकता का क़तई नहीं है, हिरोइन के विचारों से व्यक्तित्व से प्रभावित होकर वह शिक्षा के महत्व को समझता है, हराम - हलाल पैसे के बारे में जानता है, और अच्छी - अच्छी किताबों का अध्ययन करता है, काला बाज़ार छोड़कर शरीफ़ ईमानदार सच्चा आदमी बनता है।

फिल्म का संगीत भी बहुत अच्छा है, हिरो हिरोइन की ख़ूबसूरती के कशीदे नहीं गाता फिरता हर एक गीत में उसे एक संवेदनशील मार्गदर्शक के रूप में अपना बनाना चाहता है। आम तौर पर फिल्मी गीतों में चाँद ज़रूर हिरो हिरोइन की मन:स्थिति के अनुसार साथ-साथ चलता है, इस फिल्म में भी "खोया - खोया चाँद" प्यारा-सा गीत हमेशा प्रेमी जोड़ों को याद आता रहेगा।

सूरह बकरा पढ़ने के फायदे

Sunday, January 20, 2019

ज़िला कार्यक्रम पदाधिकारी स्थापना सीतामढ़ी ने मध्य विद्यालय परिहार के निकासी एवं व्यन पदाधिकारी के वेतन भुगतान पर लगाया रोक



ज़िन्दगी सादगी से जीने का नाम है

ऐ बादल बता तेरा मज़हब कौन सा है - गुलज़ार

ऐ बादल बता तेरा मज़हब कौन सा है - गुलज़ार

मस्जिद पे गिरता है
मंदिर पे भी बरसता है..
ए बादल बता तेरा मजहब कौनसा है........।।

इमाम की तू प्यास बुझाए
पुजारी की भी तृष्णा मिटाए..
ए पानी बता तेरा मजहब कोन सा है.... ।।

मज़ारो की शान बढाता है
मुर्तीयों को भी सजाता है..
ए फूल बता तेरा मजहब कौनसा है........।।

सारे जहाँ को रोशन करता है
सृष्टी को उजाला देता है..
ए सुरज बता तेरा मजहब कौनसा है.........।।

मुस्लिम तूझ पे कब्र बनाता है
हिंदू आखिर तूझ में ही विलीन होता है..
ए मिट्टी बता तेरा मजहब कौनसा है......।।

ऐ दोस्त मजहब से दूर हटकर, इंसान बनो
क्योंकि इंसानियत का कोई मजहब नहीं होता.।।

गुलज़ार

Saturday, January 19, 2019

प्रखंड विकास पदाधिकारी परिहार के आश्वासन पर बिहार पंचायत - नगर प्रारम्भिक शिक्षक संघ मूल परिहार का तालाबन्दी समाप्त

प्रखंड विकास पदाधिकारी परिहार के आश्वासन पर बिहार पंचायत - नगर प्रारम्भिक शिक्षक संघ मूल परिहार का तालाबन्दी समाप्त
बिहार पंचायत - नगर प्रारम्भिक शिक्षक संघ मूल प्रखण्ड इकाई परिहार के तत्वधान में पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक आज 19 जनवरी 2019 को शिक्षकों के स्थानीय समस्याओ के निराकरण को लेकर ,प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी के कार्य व प्रखण्ड मुख्यालय से अनुपस्थित रहने के विरुद्ध अनिश्चित कालीन धरना प्रदर्शन व BRC में तालाबन्दी कार्यक्रम का आयोजन प्रखण्ड अध्यक्ष मोहम्मद फ़िरोज़ आलम की अध्यक्षता में आयोजित हुआ।
प्रखण्ड विकास पदाधिकारी परिहार द्वारा  28 जनवरी 2019 तक सभी समस्याओं के निष्पादन का आश्वासन दिया और तालाबन्दी व धरना प्रदर्शन को समाप्त करने की अपील की, अपील मानते हुए संघ ने तालाबंदी धरना प्रदर्शन को समाप्त कर दिया।

माननीय मुख्यमंत्री बिहार सामान्य मुस्लिम जिनको तालीमी मरकज़ से हटा दिया गया है उनकी सेवा बहाल कीजिए :- मोहम्मद कमरे आलम

माननीय मुख्यमंत्री बिहार सामान्य मुस्लिम जिनको तालीमी मरकज़ से हटा दिया गया है उनकी सेवा बहाल कीजिए :- मोहम्मद कमरे आलम

माननीय मुख्यमंत्री के द्वारा मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक पिछड़ेपन को देखते हुए मुस्लिम समुदाय के 06 से 10 वर्ष के बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए वर्ष 2008 में बिहार शिक्षा परियोजना परिषद के द्वारा वैकल्पिक एवं नवाचारी शिक्षा कार्यक्रम अंतर्गत राज्य में ""तालीमी मरकज़ "का प्रारंभ किया गया था जिसे बाद में संशोधित कर वर्ष 2009 में परिशिष्ट 1 में सम्मिलित मुस्लिम जातियों के लिए आरक्षित कर दिया गया फिर पुनः सम्पूर्ण मुस्लिम समुदाय के लिए खोल दिया गया था।
1.तालीमी मरकज़ पर नामांकित मुस्लिम बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा देने के लिए शिक्षा स्वंय सेवक के रूप सम्पूर्ण बिहार में सामान्य जाति के लोगों का भी नियोजन किया गया था।
2.10 दिसंबर 2012 से तालीमी मरकज़ का संचालन सरकार के आदेश से जन शिक्षा विभाग बिहार पटना के अधीन किया जा रहा है। वर्ष 2012 - 2013 में राज्य संपोषित कार्यक्रम " महादलित, अल्पसंख्यक एवं अतिपिछड़ा वर्ग अक्षर आँचल योजना "शुरू किया गया और उसमें सभी तालीमी मरकज़ के शिक्षास्वंय सेवी को शिक्षा स्वंय सेवक के रूप में तत्कालीन प्रधान सचिव शिक्षा विभाग के आदेश पर रखा गया था।

3.इधर 2018 में 2009 में निर्गत दिशा निर्देश को ही आधार बनाकर सभी अल्पसंख्यक मुस्लिम सामान्य जाति के शिक्षा स्वंय सेवक को सेवा मुक्त किया जा रहा है।

4.23 जुलाई 2018 को "महादलित दलित एवं अल्पसंख्यक अतिपिछड़ा वर्ग अक्षर आँचल योजना "चयन एवं सेवाशर्त 2018 निर्गत कर योजना को पूरी तरह आरक्षित कर दिया गया है।
माननीय मुख्यमंत्री महोदय सामान्य जाति के शिक्षा स्वंय सेवी आठ साल की सेवा उक्त योजना में देने के पश्चात सेवा मुक्त कर दिए गए हैं अब उनकी उम्र भी नहीं बची है कि दूसरे सेवा में जा सकें।सेवा मुक्ति की कार्रवाई से पूरा परिवार सड़क पर आ गया है और बेरोजगारी भूकमरी की समस्या आ गई है।
5.माननीय मुख्यमंत्री महोदय जी ये सच्चाई है कि अल्पसंख्यक मुस्लिम सामान्य जाति के लोगों की आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक स्थिति आज की तारीख़ में परिशिष्ट 1 में सम्मिलित मुस्लिम जातियों से भी बदतर है आप बिहार के राजा हैं आंकड़ा मँगवा कर देख सकते हैं।
अतः विनम्र निवेदन है कि सामान्य शिक्षा स्वंय सेवकों को पूर्वत बहाल रखने का आदेश शिक्षा विभाग को देने की कृपा करें या सेवा मुक्त किये गए सामान्य शिक्षा स्वंय सेवकों को बिहार सरकार के विभिन्न विभागों में रिक्त पदों पर योग्यतानुसार समायोजित किया जाए ताकि आपके "न्याय के साथ विकास "का नारा परिलक्षित  हो।

UPSC-Civil Services की तैयारी कर रहे मुसलिम छात्रों के लिए जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कोचिंग सेंटर में दाखला के लिए

जामिया मिलिया इस्लामिया नई दिल्ली मुस्लिम उम्मीदवारों के लिए UPSC-Civil Services  के लिए कोचिंग में मुफ्त प्रवेश के लिए प्रतियोगी परीक्षा आयोजित करने जा रहा है ।
मुसलमानों के लिए यह प्रशिक्षण मुफ्त है उन्हें कोचिंग में दाखला के लिए प्रवेश परीक्षा पास करना होगा ।
विवरण  तफ़सीलात के लिए जामिया मिल्लिया इस्लामिया नई दिल्ली के वेबसाइट www.jmi.ac.in पर जाएं
संपर्क नंबर 011-65414144
011-26981717

अजीब बात है न लोक सभा से सामान्य आरक्षण बील पास होता है और बिहार में सामान्य मुस्लिम को तालीमी मरकज़ की नौकरी से निकाल दिया जाता हैऔर आर्थिक रूप से अपाहिज बना दिया

कितनी अजीब बात है न लोक सभा से सामान्य आरक्षण बील पास होता है और बिहार में सामान्य मुस्लिम को तालीमी मरकज़ की नौकरी से निकाल दिया जाता है। हाँ दोस्तों बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने ऐसा ही कारनामा कर दिखाया है पहले तो बिहार सरकार ने वर्ष 2008 में आर्थिक रूप से पसमांदा मुस्लिम सामान्य को तालीमी मरकज़ में शिक्षा स्वंय सेवक के रूप में बहाल किया और वर्ष 2018 में नौकरी से बाहर निकाल दिया।
नीतीश कुमार की सरकार का ये चेहरा कोई नया नहीं है कहने को तो ये सरकार कहती है न्याय के साथ विकास मगर ये कथन सिर्फ भाषणों में कही जाने वाली बातें हैं।सामान्य मुस्लिम समुदाय के नौजवानों को तालीमी मरकज़ में बहाल कर उनके नौजवानी को बर्बाद करने का एक सोची समझी साजिश थी अगर ऐसा नहीं होता तो निरन्तर आठ साल तक खिदमत लेने के बाद नियमों का हवाला देकर एक झटके में हटा नहीं दिया जाता।जब सरकार ये देखी कि अब ये कोई दूसरी सरकारी सेवा में नही जा सकते क्योंकि इनकी उम्र सरकारी सेवा के लायक बची ही नहीं तो अब ये नौकरी में जा नही सकते तो इनको हटा दिया और एक तरह से आर्थिक रूप से अपाहिज बना दिया।

आज ही बिहार पंचायत - नगर प्रारंभिक शिक्षक संघ , मूल , प्रखण्ड इकाई परिहार , सीतामढ़ी प्रखंड संसाधन केंद्र में तालाबन्दी धरना प्रदर्शन

शिक्षकों के विभिन्न समस्याओं का बार-बार पत्र देने के बावजूद निराकरण नहीं होने से आहत शिक्षक संघ निम्न मांगों के समर्थन में आज प्रखंड संसाधन केन्द्र परिहार में बिहार पंचायत - नगर प्रारंभिक शिक्षक संघ , मूल , प्रखण्ड इकाई परिहार  सीतामढ़ी , प्रखंड संसाधन केंद्र में तालाबन्दी धरना प्रदर्शन तालाबंदी कर विरोध दर्ज कराएगा जिस का नेतृत्व प्रखंड अध्यक्ष जनाब फ़िरोज़ आलम करेंगें।

  

Thursday, January 17, 2019

ایسا لگتا ہے مرگیا ہوں میں


🖍جمیل اخترشفیق

رات کے لگ بھگ ڈیڑھ بج رہے ہوں گے ،ہر طرف خاموشی کا پہرہ تھا سینے میں کسی انجانے خوف سے طوفان انگیز کیفیت برپا تھی، پورا جسم پسینہ پسینہ ہورہا تھا، آنکھیں بار بار خشک اور تر ہورہی تھیں،باہر  کتّوں کے رونے کی آوازیں فضا میں مزید وحشت کا زہر گھول رہی تھیں اس روز محض اس خیال سے کہ کسی طرح نیند آجائے میں نے روم کی بجلی گھنٹوں پہلے گُل کردی تھی،لیکن پھر بھی حال یہ تھا کہ صرف نیند ہی نہیں سکون تک مجھ سے خفا ہوکر ایسا لگتا تھا کوسوں دور جا چکا تھا، پتہ نہیں زندگی کبھی کبھار اس طرح سے کس جرم کا انتقام لینا چاہتی ہے، ایک عجیب سی گھبراہٹ،عجیب سی الجھن ذہن ودماغ پہ طاری تھی سمجھ میں یہ نہیں آرہا تھا کہ کیا کیا جائے بس یوں محسوس ہوتا تھا جیسے کوئ طاقتور آدمی میرے جسم کو پوری شدت سے گھنٹوں دباکر رکھے۔

اس نوعیت کا یہ میری زندگی کا تیسرا حادثہ تھا جو اس روز موت بن کر میرے سر پہ منڈ لارہا تھا کبھی کبھی تو یولگتا ہے جیسے میری حساسیت کسی روز میرا گلا گھونٹ کر رکھ دے گی۔

صدمات جھیلتے جھیلتے، اذیتیں براداشت کرتے کرتے انسان کا کلیجہ شاید کربناک احساسات کا گڑھا بن جاتا ہے،جی میں آیا کہ بھائیوں کو آواز دوں،امی.....امی..... پوری شدت سے پکاروں لیکن جسم کا ارتعاش  لبوں کی کپکپاہٹ، بدن کی نقاہت اجازت نہ دے سکی اور غموں کے لہو میں ڈوبے ہوئے الفاظ حلق میں ہی دب کر رہ گئے ۔

وہ رات میرے ذہن وقلب پہ کسی جلّاد کی مانند ایسے کھڑی تھی کہ پل بھر کے لیے یوں لگا جیسے میری آنکھیں ہمیشہ کے لیے بند ہوجائیں گی، میں صبح کا سورج نہیں دیکھ پاؤں گا، میرے خوابوں کے وہ سارے شیش محل جو مجھے تنہائ میں بھی اندر سے بہت شاد رکھتے ہیں ٹوٹ کرزمین بوس ہوجائیں گے،عالمِ تصور میں میری نگاہیں دو دنیا کو دیکھ رہی تھیں ایک وہ دنیا جس میں مرکر رب کے حضور سب کو پیش ہونا ہے دوسری وہ دنیا  جس میں میری زندگی کا ایک ایک پل گزرا تھا، جس میں ماں باپ، فیملی رشتہ دار ،جان پہچان کے عزت دینے والے، پلکوں پہ بٹھانے والےسارے لوگ تھے، جہاں میرے مستقبل کے عزائم کی حسین عمارتیں آنکھوں میں ہمت کا نور پیدا کرتی تھیں لیکن محض اس رات موت کے تصور نے میرے ارمانوں، خواہشوں، اور آرزؤں کی بلند وبالا عمارتوں کو یوں لگا جیسے یکلخت منہدم کردیا ہو ۔مجھے ذہن وقلب پہ طاری ساری دنیاوی چیزیں بہت حقیر نظر آنے لگی تھیں،وہ سارے چہرے نظروں سے اوجھل ہوچکے تھے جنہیں میں جان سے زیادہ عزیز رکھتا ہوں، بار بار نگاہوں کے سامنے صرف میرے اعمال رقص کررہے تھے اور آنکھیں بیساختہ برس پڑتی تھیں، میں پل بھر کے لیے اپنا نام، شان، خواب سب کچھ بھول چکا تھا موت کے تصور نے مجھے اتنا اندر سے بےبس کردیا تھا کہ میں نے اس بدحواسی میں ایک بار نہیں باربار اس خیال سے وضو کیا کہ چلو جب سامنے ملک الموت کھڑا ہی ہے، چند منٹوں میں بدن سے میری روح نکال لی ہی جائے گی تواعمال میں نیکیوں کا انبار نہ سہی اپنے رب کے حضور کم ازکم حالتِ وضو میں پیشی تو ہوگی ، ممکن ہے اگر رب ذوالجلال نے  میری حالت پہ ترس کھاکر نظررحمت ڈال دیا تو یقیناً نجات کی راہ آسان ہوجائے گی، مجھے یاد آتا ہے ان خیالوں میں گُم میں نے سردی کی اس کپکپاتی ہوئ رات میں بھی ننگے فرش پہ نمازِ تہجد ادا کی اور اس بات کا احساس تک نہیں رہا کہ موسم کیسا ہے، وضو کے بعد بھیگا ہوا ہاتھ پونچھنا باقی رہ گیا ہے، بدن پہ چادر رکھنا بھول گیا ہوں کچھ بھی احساس نہیں تھا بس سجدے میں سررکھ کر جی کرتا تھا آنکھوں میں جتنے آنسو ہیں آج ہی بہاکر دامنِ عمل صاف کرلیے جائیں، حالت ایسی تھی کہ اس جان لینے والی سردی میں اگر میرے سامنے برف کی چٹان ہوتی تو شاید میں اس خوف کے عالم میں بغیر کچھ بچھائے اس پہ بھی سجدہ ریز ہوجاتا اس روز ایک ہی فکر دامن گیر تھی کہ کسی طرح میرا خالق مجھ سے راضی ہوجائے، میں اس کی بارگاہ میں سرخرو ہوجاؤں اور کچھ نہیں.......!

ہائے....... میں اسی روز سے بس یہی سوچ رہا ہوں کہ محض موت کے احساس کی شدت نے مجھے اس درجہ بےبس کردیا کہ پل بھر میں سب کچھ بھول گیا، اورجب انسان کے جسم سے روح نکالی جاتی ہوگی تو مرنے والے پہ کیا گزرتی ہوگی؟

بہار اب بجلی میں خود کفیل ہوگیا ہے , نتیش کمار

بہار  اب بجلی میں خود کفیل  ہوگیا ہے , نتیش کمار

سیتامڑھی محمدارمان علی
بہاربجلی کے معاملہ میں خود کفیل ہوگیا ہے, ہم نے 2006کے 15اگست کو گاندھی میدان پٹنہ میں اعلان کیا تھا کہ جہاں بجلی نہیں ہے وہاں بجلی لگے گی نہیں تو ہم وہاں ووٹ کیلئے نہیں جائینگے ان خیالات کااظہاروزیر اعلی بہار جناب نتیش کمار نے سیتامڑھی کے ڈمرا بلاک کے پرمانند پور گاؤں میں 620کڑور روپے کی لاگت سے بننے والے پاور گڑیڈ سب اسٹیشن کا سنگ بنیاد رکھنے کے بعدایک اجلاس عام سے خطاب کے دوران کیا ,انہوں نے کہا کہ اس پاور سب اسٹیشن کی تعمیر کا کام دوسال میں مکمل ہوجائےگا اور یہاں سے سیتامڑھی دربھنگہ مغربی ومشرقی چمپارن اور شیوہر کو ضرورت کے مطابق بجلی مہیا کرائ جائیگی, انہوں نے کہا کہ ہماری سرکار انصاف کے ساتھ ترقیاتی کام کرنے میں یقین رکتھی ہے, اس ضلع میں جنتے بھی پل پلیا بنےہیں وہ این ڈی اے کی سرکار نے تعمیر کرائ ہے, مہسول ریلوے کراسنگ کو جوڑنے والی سڑک بھی عنقریب بنے گی, لگما سے ڈمرا ہوتے ہوئے سیتامڑھی کو جوڑنے والی سڑک کی تعمیر کا کام بھی جلد ہی شروع ہوجائےگا اس موقع پر مرکزی وزیر توانائ آزادانہ چارج آرکے سنگھ نے کہا کہ اس پاور گریڈ سب اسٹیشن کی تعمیر متھلانچل ٹرانسمیشن لیمیٹیڈ, پاور گریڈ کارپوریشن آف انڈیا لیمیٹیڈ کے ذریعہ کیا جارہاہے, اس پاور گریڈ کی تعمیر 36ایکر زمین کیا جارہا ہے, 400/220/132kv کا یہ سب اسٹیشن دوسال میں مکمل ہوجائےگا ویجندرپرسادیادو وزیر توانائ حکومت بہار نے اپنے خطاب میں کہا کہ اس پاور سب اسٹیشن کے بنے کے بعد بجلی کی کوئ کمی نہیں رہے گے اور نہیں لو وولٹیج کی پریشانی رہے گی وزیر تعمیرات سڑک نند کشور یادو نے کہا کہ این ڈی اے کی سرکار نے بہار میں سڑکوں کا جال بچھا دیا ہے اس موقع پر مقامی ایم پی رام کمار شرما نے ضلع میں التوا میں پڑے کاموں کا بڑی بے باکی کے ساتھ معاملہ اٹھایا اور وزیر اعلی سے وقت رہتے ان کاموں کو پورا کرانے کا مطالبہ کیا, اس موقع پر سیتامڑھی کے ایم ایل اے سنیل کمار کسواہا, ڈاکٹر رنجو گیتاایم ایل اے باجپٹی, سنیتا سنگھ چوہان ایم ایل اے بیلسنڈ, امیت کمار ٹناایم ایل اے ریگا, دیویش چندر ٹھاکر, ایم ایل سی, رامیشور کمار کسواہا سابق ایم پی نول کشور رائے, سابق ایم ایل اے گڈی چودھری, سابق ایم ایل سی پروفیسر اسلم ازاد, اخیر میں ڈی ایم ڈاکٹر رنجیت کمار سنگھ نے سبھی مہمانوں کا شکریہ ادا کیا

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