Saturday, January 12, 2019

एक्सा सिविल कोड लागू करने की साज़िश

एक्सा सिविल कोड लागू करने की साज़िश

मो●कमरे आलम

हमारा मुल्क जम्हूरी है, यहाँ हर शख्स को धार्मिक आज़ादी हासिल है सरकार या अदालत की जानिब से मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तछेप और समाजी सुधर के बहाने पर्सनल लॉ में परिवर्तन की इजाज़त नहीं दी जा सकती।तीन तलाक़ और बहुविवाह मुस्लिम पर्सन्नल लॉ का लाज़मी हिस्सा है इसमें किसी तरह का परिवर्तन ना मुमकिन है।शरीयत पर अम्ल करना आइनी हक़ूक़ और सेकुलरिज्म के खिलाफ कैसे हो सकता है, जबकि भारतीय संविधान में हर बाशिंदे को अपने धर्म के मुताबिक अम्ल की आज़ादी दी गई है।तीन तलाक़ और बहुविवाह क़ुरान वो सुन्नत से साबित हैं और यह इस्लामी शरीयत का लाज़मी जुज़ है।मुल्क की अदालत आलिया ने पहले भी कई मसाएल में पर्सनल लॉ के मुताबिक फैसले कर चुकी है।ज़ेरे बहस मसाएल में यही रवैया अख्तेयार करने की ज़रूरत है ।यह किसी तरह मुनासिब नहीं कि केंद्रीय सरकार या अदालते आलिया की किसी कार्रवाई से किसी भी तबक़ा में बे इतमीनानी पैदा हो और उसे वह अपने पर्सनल लॉ और धार्मिक कार्यों में हस्तछेप समझें, क्यों कि हिंदुस्तान के कानून ने सभी धर्मों और समुदाय को अपने धर्म के अनुसार ज़िन्दगी गुजरने का हक़ देता है।इन हालात में मुस्लिम पर्सनल लॉ मे किसी तरह की कोई परिवर्तन ना क़ाबिले क़बूल है।

बीजेपी की क़यादत वाली केंद्रीय सरकार का गुप्त एजेंडा अब खुल कर सामने आने लगा है और एक्सा सिविल कोड के लागू करने की राह हमवार करने के लिए हक़ूमत ने मुल्क की सबसे बड़ी अकलियत यानि मुसलमानों के पर्सनल लॉ में हस्तछेप करते हुए तीन तलाक़ और बहू विवाह के विरुद्ध अपनी राय ज़ाहिर की है।मुल्क में आज़ादी के बाद यह पहला मौक़ा है जब केंद्रीय सरकार ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के विरुद्ध इतना आक्रामक रुख अख़्तेयर किया है।तीन तलाक़ और बहू विवाह से सम्बंधित उच्चतम न्यायालय में केंद्रीय सरकार के दुयारा पेश की गई राय ना क़ाबिले क़बूल है ।मुसलमानों के लिए क़ुरान और हदीस ही सबसे बड़ा नियम है और धार्मिक कार्यों में शरीयत ही रहनुमा वसूल है जिस में क़यामत तक कोई संशोधन मुमकिन नहीं और समाजी सुधार के नाम पर शरीयत में कोई परिवर्तन नहीं की जा सकती।मालूम हो कि मोदी सरकार की ओर से उच्चतम न्यायालय में दाखिल शपथ पत्र में कहा गया है कि " पर्सनल लॉ के आधार पर मुस्लिम महिलाओं के कानूनी हक नहीं छीने जा सकते और इस सेक्युलर मुल्क में तीन तलाक़ के लिए कोई जगह नहीं है " ।।

             जमीयतुल ओलमा ए हिन्द इस मामले में बतौर फ्रीक़ अपनी राय उच्चतम न्यायालय में ज़ाहिर कर चुकी है कि मुसलमानों के धार्मिक कार्य क़ुरान व हदीस कि रौशनी में तय होते हैं और समाजी सुधार के लिए इसे दुबारा नही लिखा जा सकता और न ही रहती दुनिया इसमें कोई परिवर्तन मुमकिन है।धर्म के मामले में मुसलमानों के लिए क़ुरान और हदीस के अलावा और कोई नियम नही है।अदालत ने इस मामले में आवामी राय तलब किया है मुस्लमान मर्द व औरत से गुज़ारिश है कि वह विधि आयोग के सामने अपनी राय मज़बूती के साथ पेश करें ।दोस्तों केंन्द्रीय सरकार मुस्लिम पर्सनल लॉ में मुदाखलात कर समान आचार संहिता लागू करने की ओर बढ़ रही है जो इस कसीर मुल्क में संभव नहीं है।जिस समय मुल्क आज़ाद हुआ जमीयतुल ओलमा हिन्द ही मुसलमानों की सबसे बड़ी संस्था थी और उसने मुल्क की आज़ादी में साल्हा साल सक्रिय भूमिका निभाई थी।उस समय मुस्लमान नेताओँ ने महात्मा गांधी और पंडित नेहरू समेत सभी अहम् नेतओं से अस्पष्ट तौर से कह दिया था कि हम आपके साथ तब ही रह सकते हैं जब आप हमें अपने मुल्क हिंदुस्तान में धार्मिक आज़ादी के साथ रहने का कानूनी हक़ देंगें और इन्हीं शर्तों की बुनियाद पर उसवक़्त के नेताओं ने मुल्क का सेक्युलर क़ानून तैयार किया था और अल्पसंख्यकों को उनके धार्मिक कार्य करने की पुरी क़ानूनी आज़ादी दी गई थी।लेकिन वर्तमान सरकार मुल्क़ की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक मुसलमानों के पर्सनल लॉ में बिला वजह हस्तछेप कर के मुल्क में समान आचार संहिता लागू करने की राह तैयार कर रही है।मालूम हो कि उच्चतम न्यायालय में  न्यायमूर्ति विक्रम सेन और न्यायमूर्ति शिवकीर्ति सिंह के द्वारा 15 दिसम्बर2015 को एक शो मोटो नोटिस जारी कर के यह जवाब तलब किया था कि "क्यों न समान आचार संहिता बनाया जाए "।जमीयतुल ओलमा ने 05 फरवरी 2016को इस मामले में intervenar बनने की अर्जी दी थी इस अर्ज़ी को मंज़ूर करते हुए उच्चतम न्यायालय ने छः हफ़्ते के अंदर आपत्ति और जवाब दाख़िल करने को कहा था उसी दौरान फरह फैज़ ने जमीयतुल ओलमा के रिट याचिका के विरूद्ध 28 फरवरी 2016 को उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की।जिसका जवाब जमीयत ने 17 मार्च को दाख़िल किया और 28 मार्च को जमीयत की ओर से विस्तृत शपथ पत्र और इशू पर मुकम्मल राय दाख़िल किया गया और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी 02 दिसम्बर को उच्चतम न्यायालय के शो मोटो नोटिस के विरुद्ध अपनी आपत्ति जताई है।

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