Monday, January 21, 2019

नील कमल की तुलना में वहीदा रहमान जी की फिल्म काला बाज़ार कहीं बेहतर फिल्म है !!

!! नील कमल की तुलना में वहीदा रहमान जी की फिल्म काला बाज़ार कहीं बेहतर फिल्म है !!

नील कमल अच्छी अभिनेत्री की घटिया फिल्म, काला बाज़ार अच्छी अभिनेत्री की बहुत-बहुत अच्छी फिल्म, वहीदा रहमान बेहतरीन अभिनेत्री हैं सभी दृष्टि से, सुंदरता की दृष्टि से, अभिनय की दृष्टि से, नृत्य की दृष्टि से भी।

नील कमल फिल्म में सब एक से बढ़कर एक शानदार कलाकार हैं बलराज साहनी, वहीदा रहमान, राजकुमार, मनोज कुमार, ललिता पवार, मेहमूद उस फिल्म का संगीत भी बहुत उम्दा है "बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले"मुहम्मद रफ़ी साहब का गाया एक अहसास मंद बेहतरीन गीत जो आज भी प्रासंगिक है होंठों पर शादी-ब्याह के मौक़े पर आ ही जाता है। मगर फिल्म की कहानी अंधविश्वास के धरातल पर बनी है पहला जन्म दूसरा जन्म पुनर्जन्म इत्यादि, सास ननद का जो जलने - फुकने वाला मियां बीवी में दरार पैदा करने वाला किरदार दिखाया गया है वह कुछ हद तक ठीक है स्वभाविक है, अक्सर घरों में औरतें सास - बहू ननद - भाभी देवरानी-जेठानी के रूप में खलनायिका होती हैं, वहीदा रहमान की सास - ननद नन्दोई तक कहानी और उनके किरदार कुछ समझ में आते हैं हजम होते हैं ।

मनोज कुमार भी राम की तरह भड़कावे में आकर, अपनी पत्नी के चरित्र पर शक़ करके त्याग देते हैं और हिरोइन भी इस अपमान का विरोध न कर ऐसे शक़ करने वाले कान के कच्चे पति को दुबारा पाने की कामना किये हुए, सीता मइया  की तरह साधू महाराज की शरण में भजन कीर्तन करने चली जाती है। तीनों हिरो - हिरोइन के किरदार कोई प्रगतिशील आधुनिक विचारक आदर्शवादी व्यक्तित्व के नहीं हैं।

फिल्म के हिरो राजकुमार पिछले जन्म के प्रेमी का किरदार निभा रहे हैं मर गए हैं, और मरने के बाद अपनी मरी हुई प्रेमिका जो दूसरा जन्म ले चुकी है उसे गीत गा - गा कर पुकारते हैं संपने में आते हैं, और हिरोइन भी पिछले जन्म के प्रेमी की पुकार सुनकर नींद में उठकर चल देती है। यह बात हजम नहीं होती!! मरने के बाद आदमी मिट्टी का राख का ढेर होता है उसमें फिर कोई ताक़त नहीं, न वो खा - पी सकता है, चल सकता है उठ बैठ सकता है गाना भी नहीं गा सकता, बुद्धि और भावना प्रेम घृणा कोई अहसास भी उसमें नहीं रहता, हिरोइन को नींद में चलने की बीमारी है तो साइकेटरिस क्यों नहीं है फिल्म में? नींद में चलना बीमारी है आत्मा की पुकार नहीं, आत्मा की आवाज़ होती ही नहीं जिसे सुनकर कोई ज़िंदा आदमी उसे फॉलो करे, इस तरह की बातें अंधविश्वास पर आधारित हैं मिथक हैं जिसका सहारा अक्सर फिलमों में लिया जाता है, और तीन घंटे तक दर्शकों को बेवकूफ़ बनाया जाता है उन्हें अंधविश्वास मिथक की ओर धकेला जाता है, ऐसे विषय पर बहुत फिल्में बनी हेमामालिनी की 'क़ुदरत' श्री देवी की 'बंजारन' मधुबाला की महल, फागुन दिलीप कुमार वैजयंती माला की 'मधुमती' जयपर्दा की 'माँ' फिल्म, अफसोस अभी भी ऐसी फिल्में बनती हैं विद्या बालन की फिल्म 'भूलभुलैया' ऐसी ही पुनर्जन्म आत्मा - वात्मा की नौटंकी पर आधारित सुपरहिट फिल्में हैं मनोरंजन ब्लॉकबस्टर के लिए दर्शकों को कुछ भी दिखाया जाता  है।

मैंने वहीदा रहमान जी की दूसरी फिल्म काला बाज़ार का ज़िक्र किया जो बहुत अच्छे विषय पर आधारित है सत्य - असत्य काला बाज़ार पर आधारित, स्वतंत्रता के बाद भारत में जो ग़रीबी, भुखमरी, बेरोजगारी जनसंख्या जैसी समस्याएं उत्पन्न हुईं, और उन्हीं समस्याओं के कारण भ्रष्टाचार झूट मारपीट हत्या काला बाज़ार जैसी समस्याएं उत्पन्न हुईं जिसका यथार्थ और सजीव चित्रण फिल्म काला बाज़ार में दिखाया गया है, कैसे कोई ग़रीब बेरोज़गार शख़्स मज़बूरन स्थिति के सामने झुक जाता है, और काला बाज़ार का हिस्सा बन जाता है। जायज़ क्या है नाजायज़ क्या है हराम रोज़ी क्या है हलाल रोज़ी क्या है इसका ज्ञान फिल्म कराती है अपने पात्रों के माध्यम से, और हलाल हराम पैसे का क्या अंत होता है अंजाम होता है यही सब काला बाज़ार फिल्म में शुरू से अंत तक चलता रहता है।

इस फिल्म में सबसे रोचक और दिलचस्प किरदार है फिल्म की हीरोइन वहीदा रहमान का, जो फिल्म में किसी सुंदर स्त्री के रूप में नहीं हैं जैसा कि हर फिल्म में होता है हिरोइन बहुत सुंदर होती है, उसकी सुंदरता का नखशिख वर्णन हिरो गा - गा कर करता रहता है, "" चौदहवीं का चाँद हो"  "कश्मीर की कली" फूलों सा चेहरा" "नर्गिस - ए- मस्ताना" इत्यादि- इत्यादि, न ही रंभा मेनका ऊरवशी की तरह सुंदर है हिरो के चारों तरफ गीत गाती नाचती फिरती है। अधिकतर हर फिल्म में हिरोइन को सुंदर और कहानी को आगे बढ़ाने रोचक बनाने रोमांटिक बनाने के लिए लिया जाता है, एक शो पीस की तरह, वही जकड़ी मानसिकता सामंती व्यवस्था की तरह त्याग घरेलू महिला, हिरो के साथ घूमना मटकना ठुमके लगाना दो चार गानों में हिरोइन का रोल ख़त्म बस यहीं तक सीमित। बहुत कम फिल्में हैं जिनमें हिरोइन प्रगतिशील महिला की तरह, विचारक,, बुद्धिजीवी, मार्गदर्शक की तरह,, सरवाइवर की तरह दिखाई जाती हैं।

फिल्म काला बाज़ार में वहीदा रहमान किसी सुंदरता की मूर्ति की तरह नहीं, बल्कि एक शिक्षित विचारक मार्गदर्शक के रूप में हैं, जो अपने फैसले ख़ुद करती है।हिरोइन की ऐंट्री किसी हूरपरी की तरह नहीं बल्कि सिनेमा घर के बाहर ब्लेक में ख़रीदी टिकट फाड़कर होती है, हिरो - हिरोइन के बीच प्रेम की बुनियाद सुंदरता धन - दौलत रुपये पैसे नहीं,  संवेदना विचार दृष्टिकोण मार्गदर्शन के आधार पर है । फिल्म में हिरो  हिरोइन की सुंदरता पर मोहित नहीं उसके विचारों पर होता है, वह उसे भोग की वस्तु के  रूप में नहीं देखता, न ही उसे अपनी ज़रूरत पूरा करने के सामान के रूप में अपनाना चाहता है, बल्कि एक मार्गदर्शक के रूप में उसे अपना जीवन साथी बनाना चाहता है, बिल्कुल फिल्म साथ-साथ के हिरो फ़ारूख़ शैख़ की तरह है, और वहीदा जी भी दीप्ति नवल की तरह।

""तुमको देखा तो ये ख़्याल आया ज़िंदगी धूप तुम घना साया,तुम चले जाओगे तो सोचेंगे हमने क्या खोया हमने क्या पाया "

फिल्म का हिरो कम पढ़ा - लिखा था सिर्फ़ आठवीं कक्षा तक मगर पुरुषवादी मानसिकता का क़तई नहीं है, हिरोइन के विचारों से व्यक्तित्व से प्रभावित होकर वह शिक्षा के महत्व को समझता है, हराम - हलाल पैसे के बारे में जानता है, और अच्छी - अच्छी किताबों का अध्ययन करता है, काला बाज़ार छोड़कर शरीफ़ ईमानदार सच्चा आदमी बनता है।

फिल्म का संगीत भी बहुत अच्छा है, हिरो हिरोइन की ख़ूबसूरती के कशीदे नहीं गाता फिरता हर एक गीत में उसे एक संवेदनशील मार्गदर्शक के रूप में अपना बनाना चाहता है। आम तौर पर फिल्मी गीतों में चाँद ज़रूर हिरो हिरोइन की मन:स्थिति के अनुसार साथ-साथ चलता है, इस फिल्म में भी "खोया - खोया चाँद" प्यारा-सा गीत हमेशा प्रेमी जोड़ों को याद आता रहेगा।

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