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Thursday, January 17, 2019

नागरिकता अधिकार सुधार बिल का लोक सभा से मंज़ूर होना अफसोस नाक ,निशाने पर मुसलमान

नागरिकता अधिकार सुधार बिल का लोक सभा से मंज़ूर होना अफसोस नाक है।लोक सभा में नागरिकता अधिकार सुधार बिल को स्वीकृति मिल गई है जबकि विपक्ष ने बील का विरोध किया था।इस बिल के पेश किए जाने और स्वीकृति के बादकुछ अजीब सूरत ए हाल पैदा हो गई है।और कई गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं बुनियादी तौर पर यह बिल आसाम को सामने रख कर किये गए हैं।
केंद्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद और केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह बील पूरे हिंदुस्तान पर होगा।
इस बिल का अफ़सोसनाक पहलू यह है कि इसमें यह नियम रखा गया है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से जो हिन्दू, जैन, ईसाई, सिख, बुद्धिस्ट और पारसी हिंदुस्तान आयेंगे उन्हें देश में रहने के छः साल बीत जाने के बाद यहाँ की नागरिकता दे दी जाएगी।अभी क़ानून के मुताबिक कम से कम बारह साल के निवास की शर्त है।इस बिल में कहीं भी मुसलमानों का नाम नहीं लिया गया है।मुसलमानों को इस बिल से अलग रखा गया है इस के निशाने पर खास कर आसामी मुसलमान हैं जो सैकड़ों साल से आसाम में रहते आ रहे हैं।बंगाल से लगाव की वजह से उनकी भाषा बंगला है।उनकी भाषा बंगला है इस बिना पर उन्हें बंगला देसी क़रार देने पर कट्टरपंथी तुले हुए हैं और लगातार साजिश रची जा रही है।
यह भेद भाव की बदतरीन मिसाल है यह आने वाले वक्त में क्या सूरत अपनाएगी और इस के परिणाम क्या होंगें यह तो आने वाला कल ही बतलायेगा।ये बात इसलिए कही जा सकती है कि मुल्क में हर जगह मुसलमानों की एक बड़ी आबादी निवास करती है।अब इस नागरिकता क़ानून सुधार बिल से जिस तरह मुसलमानों को बिल्कुल अलग थलग रखा गया है और यह कहा जा रहा है कि पूरे देश में लागू होगा इस से पता चलता है कि किसी न किसी सूरत में दूसरे राज्यों के मुस्लिम भी इस से प्रभावित हो सकते हैं।

मुल्क में जिस किस्म के हालात हैं उनके मद्देनजर और भी तश्वीशनाकबात है कि कोई मुसलमान किसी जगह लम्बे समय से रह रहा हो और अचानक उससे इस मुल्क का शहरी होने का का सबूत मांग सकता है यह बहुत ही तीखी सूरत ए हाल होगी।इस बिल के जरिये धर्म के नाम जो फर्क की गई है वह निंदनीय है।यही वजह है कि NDA में शामिल BJP की अलाएंस पार्टियों ने भी कई विन्दुओं पर इस बिल का विरोध किया है।आसाम में असम गन परिषद सहित कई दूसरी पार्टियों ने इसकी सख्त मुखालफत की है।NDA की एक अहम पार्टी जनता दल यू ने भी इस बिल का विरोध किया है पार्टी ने कहा कि इस से वैधानिक पेचीदगी पैदा होगी और खास तौर पर एक विशेष पिरक़ा में बेचैनी फैलेगी जो देश हित में नहीं है।बिल के जो विन्दु हैं उनकी वजह से मुसलमानों में बेचैनी और नाराज़गी स्वभाविक है जिसका इज़हार व्यक्तिगत स्तर पर हो रहा है और सामुदायिक तौर पर भी कई मुस्लिम संस्थाओं ने इस बिल कर सख्त विरोध करते हुए इस के वापसी की माँग की है।होना तो यह चाहिए था कि किसी न किसी तौर पर इस बिल का तअल्लुक़ हिंदुस्तान की दूसरी बड़ी आबादी के साथ है इसलिए हकुमत मुस्लिम धर्म गुरुओं और सामाजी संस्थाओं के नुमाइंदों से मुलाकात करती और एक ऐसा मज़बूत मंसूबा तैयार किया जाता जिस पर सबका सर्वसम्मत स्वीकृति होती।बहरहाल यह बिल लोक सभा में तो पास कर दिया गया है अब इसे राज्य सभा में पेश किया जाना है राज्य सभा मे विपक्षी पार्टियों का रवैया किया होता है यह देखने की बात है क्योंकि विपक्ष ने बिल की निंदा तो की है मगर विरोध नहीं की है।राज्य सभा मे विपक्षी पार्टियों के सहयोग के बिना यह बिल मंज़ूर नहीं हो सकती।हिंदुस्तान गंगा यमुनी संस्कृति के लिए जाना जाता है इस मुल्क में विभिन्न धर्म के मानने वाले, विभिन्न भाषा बोलने वाले, अलग अलग संस्कृति से सम्बंधित लोग आबाद हैं।यही इस मुल्क की पहचान है और ताकत भी।संविधान के ज़रिए उनके अधिकारों की सुरक्षा प्रदान की गई है ऐसे में हकुमत को अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि वह ऐसा कोई कदम न उठाये जिस से मुल्क में मुल्की सतह पर बेचैनी फैले और अलगाव वाद पनपे।
2019 का लोक सभा चुनाव नजदीक आ गया है केंद्र के पास मुश्किल से 90 दिन रह गए हैं वह विवादित इस बिल के तमाम पहलुओं पर अच्छी तरह विचार करे और मुसलमानों के अधिकारों की सुरक्षा को यक़ीनी बनाये क्योंकि मुसलमान भी इस मुल्क में समान अधिकार व सुविधाओं के हकदार हैं और बराबर के नागरिक हैं।हकुमत को यह भी समझना चाहिए कि वह ऐसा फैसला न करें जिससे मुल्क की दूसरी सबसे बड़ी आबादी निशाने पर आ जायें।हकुमत और विपक्ष की दोनों की ज़िम्मेदारी है कि वह ऐसे क़दम उठायेजिस से मुसलमानों को लगे कि मुल्क में उनके दिये गए अधिकार को कोई खतरा नहीं है और वह इस प्रजातांत्रिक व्यवस्था में पूरी तरह सुरक्षित हैं।

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