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Saturday, January 26, 2019

बहारें फिर भी आयेंगी

बहारें फ़िर भी आएंगी(1966) धर्मेंद्र माला सिन्हा तनूजा रहमान जॉनी वॉकर की प्रसिद्ध ट्रेंगल लव स्टोरी फिल्म थी....क्लासिकल मूवी। मगर ग़ौर किया जाए तो एक बहुत ही अच्छा विषय फिल्म में है पत्रकारिता प्रकाशन संपादन की दुनिया से जुड़ा।

फिल्म शुरु होती है जागृति अख़बार के दफ्तर में बोर्ड मीटिंग से....जहाँ अख़बार की मालिक चेयरपर्सन माला सिन्हा (अनिता) जी भी हैं और अख़बार के संपादक दास जी और वो पूंजीपति वर्ग भी जिन्होंने अख़बार के भूतपूर्व मालिक की मृत्यु के बाद उनकी बेटी अनीता को अख़बार फिर से शुरु करने के लिए क़र्ज़ दिया है और अख़बार के शेयर ख़रीद रखें हैं।मीटिंग एक ख़बर के उपलक्ष्य में रखी गई है....अख़बार में एक रिपोर्टर की हैसियत से काम करने वाले पत्रकार मिस्टर गुप्ता(जिसकी भूमिका में धर्मेंद्र जी हैं) ने संपादक की बिना इजाज़त के खाद्दानों के मालिकों के खिलाफ़ ख़बर छपवा दी है... खाद्दानों के मालिक यही पूंजीपति हैं जो मीटिंग में बैठे हैं। और ये पूंजपति संवेदना से ख़ाली हैं मुनाफा कमाना ही इनका उद्देश्य है ...वो अख़बार के मालिक पर दबाव डालते हैं कि उनके खिलाफ़ अख़बार कोई ख़बर ना छापे ...वो कहते हैं कि "हमने अख़बार को क़र्ज़ दिया है उसके शेयर ख़रीदें हैं फिर हमारे ही ख़िलाफ़ अख़बार ख़बर कैसे छाप  सकता है"।
मीटिंग के बाद अख़बार की मालिक अनीता और पत्रकार मिस्टर गुप्ता के बीच बहस होती है। पत्रकार से सवाल होता है कि "अख़बार का नियम क्यों तोड़ा गया है ? बग़ैर संपादक की इजाज़त के ख़बर क्यों छपवाई ?" पत्रकार ज्वाब देता है कि ख़बर अहम थी संपादक पूंजीपतियों से मिले हुए हैं लाखों रुपए उनसे लेते हैं वो ये ख़बर नहीं प्रकाशित करते...खाद्दानों के मालिक अवैध तरीक़े से खाद्दानों की खुदवाई करवाते हैं जो मज़दूरों के झोंपड़ों घरों को खोकला कर रही हैं.. मज़दूरों के घर ज़ल्द ही गिर जाएंगे अगर तुरंत खाद्दानों की अवैध खुदाई को रोका ना गया... आप अख़बार की मालिक हैं ऐसे में आपका निर्णय बहुत अहम है अख़बार के ज़रिए सच को सामने लाने से मज़दूरों के घर गिरने से और उन्हें बेमौत मरने से बचाया जा सकता है"। मगर अख़बार की माल्किन मज़बूर है उसने पूंजीपतियों से क़र्ज़ ले रखा है.. वो पत्रकार को निकाल देती है मज़बूरन और पत्रकार सच्चाई के आगे झुकता नहीं वो ये कहकर "बदल जाए अगर माली चमन होता नहीं ख़ाली बहारें फिर भी आती हैं फिर भी आएंगी" वहाँ से चला जाता है। जिसका नताइज़ अच्छा नहीं होता पूंजीपतियों को ग़ैरक़ानूनी कामों में फ़रोग़ मिलता है वो अवैध तरीक़ों से खाद्दानों को खोदते हैं और मज़दूरों के घर गिर जाते हैं... रातों-रात हज़ारों मज़दूर बेघर हो जाते हैं 135 मज़दूर जान से चले जाते हैं। इस घटना से जागृति अख़बार की माल्किन अनीता को बहुत दु:ख होता है... क्योंकि वो एक संवेदनशील व्यक्तित्व रखतीं हैं ...इस घटना के बाद वो अख़बार के संपादक दास को हटा कर मिस्टर गुप्ता जो पहले उनके अख़बार में रिपोर्टर की हैसियत से काम करते थे फिर से उन्हें संपादक की हैसियत से काम देती हैं.... और निर्णय करती हैं कि उनके बाबा ने जो कभी अख़बार की शुरुआत "सत्य की जीत" उद्देश्य से रखी थी उस उद्देश्य पर ही अख़बार आगे निकलेगा चाहे जैसी भी सामाजिक राजनीतिक आर्थिक स्थिति हो....किसी के दबाव में नहीं रहेंगी।
और फिर अख़बार की माल्किन अनीता और अख़बार के संपादक मिस्टर गुप्ता सत्य की जीत को आधार बनाकर ही काम करते हैं।फिल्म में भारत चीन की लड़ाई का भी ज़िक्र है पूंजपति वर्ग युद्ध की स्थिति को भी अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करना चाहता है देश से देशवासियों से उन्हें संवेदना नहीं है....जागृत अख़बार का संपादक इस स्थिति की जाँच के लिए हर ख़बर से अपडेट रहता है यहाँ तक की युद्ध स्थल पर भी जान की परवाह न कर जाता है और अख़बार में युद्ध की स्थिति राजनीति पक्ष पूंजपति वर्ग की सच्चाई को ईमानदारी से सामने रखने की कोशिश करता है। अब ऐसे में पूंजपति वर्ग अख़बार की मालिक और चेयरपर्सन अनीता पर बोर्ड मीटिंग में दबाव बनाता है कि अख़बार में उनके ख़िलाफ़ ख़बरें ना प्रकाशित की जाएं और संपादक को बदल दिया जाए।वो इसके लिए अख़बार की चेयरपर्सन पर क़र्ज़ और शेयर का हवाला देकर अख़बार बंद होने का हवाला देकर दबाव बनाते हैं।मगर अख़बार की चेयरपर्सन उनके दबाव में नहीं आती वो साफ साफ कह देती हैं कि अख़बार अपने सत्य की जीत उद्देश्य पर ही प्रकाशित होगा। वो मीटिंग में सच्चाई पर कायम रहतीं हैं मगर स्थिति उनके वीपरीत है क़र्ज़ चुकाने की रक़म उनके पास नहीं इसलिए उनके समक्ष गंभीर स्थिति है जिससे सामना करते हुए वो ज़हनी तौर पर परेशान होती हैं। अख़बार के संपादक भी उनकी स्थिति को समझते हैं और उनकी परेशानी को दूर करने के लिए वो इस्तीफा देने का फैसला करते हैं क्योंकि वो अख़बार की चेयरपर्सन अनीता का बहुत सम्मान करते हैं।
फिल्म में इन सब स्थितियों के साथ साथ ट्रेंगल लवस्टोरी भी चलती है अख़बार के संपादक अख़बार की चेयरपर्सन अनीता की सच्चाई ईमानदारी सादगी जिम्मेदारी से युक्त व्यक्तित्व से प्रभावित होते हैं इसलिए वो उनका बहुत सम्मान करते हैं....मगर अनीता उनकी ईमानदारी और महनत सच्चाई से प्रभावित होकर उनसे मुहब्बत करने लगतीं हैं जिसकी हक़ीक़त संपादक को नहीं वो समझ ही नहीं पाते फिल्म के अंत तक....फिल्म के संपादक अनीता की छोटी बहन सुनीता(तनूजा) जो उन्हें ट्रेन के सफ़र में मिलती हैं ...वो उसकी मासूमियत से प्रभावित होकर उससे मुहब्बत करते हैं और सुनीता भी उनसे मुहब्बत करती है। जब सुनीता की बहन अनीता जो अख़बार की चेयरपर्सन हैं इस सच्चाई से वाक़िफ़ होती हैं कि उनकी छोटी बहन और संपादक गुप्ता एक-दूसरे को चाहते हैं...तब वो अपने जज़्बात पर काबू करती है और अपनी मुहब्बत को त्याग कर देती है छुपा लेती है अपनी बहन की खातिर...एक तरफ़ तो उनकी एक तरफ़ा नाकाम मुहब्बत दूसरी तरफ़ अख़बार बंद होने की चिंता दोनों स्थितियों का उनके ज़हन पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
अनीता की शख़्सियत से सब प्रभावित हैं उनकी ईमानदारी सच्चाई दृढ़ निश्चय नरम दिल से अख़बार के संपादक भी और वो भी उनका सम्मान करते हैं...मगर कोई उनकी प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ को अलग करके उन्हें नहीं देखता...उनके आदर्शवादी जिम्मेदार चरित्र में एक लड़की को उसकी ज़ाती ज़िन्दगी की ख़्वाहिश को नहीं देखता... उसकी तन्हा ज़िन्दगी तन्हा ज़िन्दगी के सफ़र को कोई नहीं देखता ...सब उसे सिर्फ़ सम्मान ही देते हैं जब्कि वो भी एक इंसान है इंसान का जिस्म रखती है दिलोज़हन रखती है ख़्वाहिश रखती है...जो बाबा के आदर्शों को बहन की अख़बार की जिम्मेदारियों को निभाते हुए दब गए हैं.. मगर महसूस तो होते हैं ...ठीक यही चरित्र वहीदा रहमान जी ने अपनी फिल्म ख़ामोशी में नर्स राधा के किरदार में निभाया है....दोनों अभिनेत्रियों ने अख़बार की चेयरपर्सन अनीता और हॉस्पिटल की नर्स राधा का किरदार बहुत संवेदनशील तरीक़े से किरदार में ढलकर निभाया है ...वहीदा जी और माला जी ने।
इन सब स्थिति में अनीता सिर्फ़ बाबा की तस्वीर है जिससे वो सब मुश्क़िलात ब्यान करती है तन्हा।
उधर जब सुनीता को यह अहसास होता है कि उसकी बहन अनीता भी संपादक गुप्ता को मुहब्बत करती है तब वो भी अपनी बहन की खातिर अपनी मुहब्बत की क़ुर्बानी देने के लिए किसी दूसरे शख़्स से शादी करने के लिए घर छोड़कर चली जाती है.....इस बात का भी अनीता के दिमाग़ पर बहुत बुरा असर होता है... और वो अपने बाबा के पुराने अख़बार के दफ्तर में उनकी तस्वीर से बातें करने चली जाती है.....जैसे वो अक्सर तन्हाई में अपने बाबा की तस्वीर से बातें करके अपना ज़ी हल्का किया करती है आज भी आई है... परेशानी में चिंता में अपने बाबा से बातें करती है ...वो नहीं चाहती की उसकी बहन किसी ऐसे शख़्स से शादी करके अपनी ज़िंदगी बर्बाद करे जो उसके लायक नहीं है ...और नहीं चाहती की अख़बार बंद हो ....तस्वीर के सामने बोलते बोलते वो निढाल हो जाती है गिर जाती है उसे दिखाई देना भी बंद हो जाता है आवाज़ भी नहीं पहचान पाती...तभी उसे ढुंढते हुए अख़बार के संपादक उसकी बहन और उसके एक मित्र(रहमान उनके मित्र की भूमिका में हैं )आते हैं..मगर अनीता जी उन्हें नहीं पहचानती ठीक से की कौन शख़्स कौन है क्योंकि वो देख नहीं पा रही आवाज़ भी नहीं पहचान पा रही...और अपने अंतिम समय में वो अख़बार के संपादक को मित्र समझकर कहती हैं कि "मैंने अपने बाबा का पुराना अख़बार का दफ्तर गिर्वी नहीं रखा था आप यहाँ बाबा के पुराने दफ्तर में फिर से अख़बार नए सिरे से शुरू करें और गुप्ता जी के साथ मिलकर शुरु करें क्योंकि वही हैं जो बाबा के आदर्श सच्चाई की जीत  को उद्देश्य बनाकर अख़बार को बरक़रार रख सकते हैं और उनसे ये मत बताईयेगा कि मैं भी उनसे मुहब्बत करती हूँ.... मेरे बाद अख़बार यहीं से दुबारा शुरु करें ..."बदल जाए अगर माली तो चमन होता नहीं ख़ाली बहारें फिर भी आतीं हैं"यहीं अनीता जी अंतिम वाक्य कहकर मर जाती हैं फिल्म समाप्त हो जाती है।
फिल्म के सभी गीत बहुत ख़ूबसूरत हैं लिरिक्स की दृष्टि से भी और गायक-गायिका संगीतकार की दृष्टि से भी।
फिल्म का मशहूर गीत जो मुहम्मद रफ़ी साहब ने गया है कौन भूल सकता है आज भी जंवा दिलों की ज़बान पर बरकरार है..."आपके हंसीन रुख़ पे आज नया नया नूर है मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कुसूर है"।
और महेंद्र कपूर जी का गीत जिसे राजेंद्र कृष्ण जी ने लिखा है वो भी बेहद ख़ूबसूरत है ज़िन्दगी की हक़ीक़त से जुड़ा हुआ है फिल्म का सार भी इसी गीत में है।
"बदल जाए अगर माली, चमन होता नहीं ख़ाली
बहारें फिर भी आती हैं, बहारें फिर भी आयेंगी
थकन कैसी, घुटन कैसी
चल अपनी धून में दीवाने खिला ले फूल काटों में
सजा ले अपने वीरानें
हवाएं आग भड़काएं फ़ज़ाएं जहर बरसाएं
बहारें फिर भी आती हैं, बहारें फिर भी आयेंगी
अंधेरे क्या, उजाले क्या, ना ये अपने ना वो अपने
तेरे काम आयेंगे प्यारे, तेरे अरमां, तेरे सपनें
जमाना तुझ से हो बरहम न आये राहभर मौसम
बहारें फिर भी आती हैं, बहारें फिर भी आयेंगी।"

आज भी भारत में ऐसी फिल्मों की ज़रूरत है जो ज़िन्दगी की हक़ीक़त को सामने रखे अख़बार पत्रिकाओं चैनलों के प्रकाशकों संपादकों मालिकों को प्रेरित कर सके सच के साथ खड़े होकर चलने के लिए...भारतीय पत्रकारिता विश्व स्तर पर सौवें स्थान से भी निचे गिर गई है ...लोकतंत्र के चारों स्तंभ ख़तरे में हैं जिनमें से एक मिडिया है। आजकल कुछ कलात्मक फिल्मों को छोड़कर ज़्यादातर फिल्में और उनके गीत संगीत बिल्कुल बेमायने हैं ज़िन्दगी की आधी से ज़्यादा हक़ीक़त से कहीं दूर। फिल्म बहारें फिर भी आएंगी प्रासंगिक है ...काश की आजकल की नफरत बिरादरी क्षेत्र के नाम पर होने वाली गंदी राजनीति के दौर में ...ख़राब सामाजिक राजनीतिक आर्थिक स्थिति में जब पूंजपति वर्ग की ख़ैरख़्वाह मिडिया है सत्ता है...पत्रकार संपादक प्रकाशक उस फिल्म के किरदारों को अपने जीवन में उतार सकते।
-मेहजबीं

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