Friday, January 11, 2019

प्रारंभिक शिक्षा में शिक्षकों की की भूमिका

प्रारंभिक शिक्षा में शिक्षकों की की भूमिका :-
मोहम्मद कमरे आलम
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प्रारंभिक शिक्षा में शिक्षकों की महत्ता से इंकार नही किया जा सकता है।शिक्षक बच्चों के मेमार (बनाने ) होते हैं अगर यह कहा जाए कि शिक्षक ही अच्छे समाज के निर्माता हैं तो यह ग़लत नही होगा ।दुनिया में जब इंसान बच्चों की तर्बीयत के मामलों में मायूस हो जाते हैं तो दो ही शख्सियत ऐसी होती हैं जो कभी भी बच्चों के भविष्य से मायूस नही होती " माॅ और शिक्षक "माँ और उस्ताद बच्चे से बिल्कुल मायूस नही होते हैं बच्चा कैसा भी हो, शरीर हो या मंद बुद्धि उसे शिक्षण- प्रशिक्षण से स्वांरते हैं।अगरचे छोटे बच्चों की तालीम व तर्बियत करने का काम बड़ा कठिन होता है।माँ तो माँ होती है मगर उस्ताद भी माँ से कुछ कम नहीं होते स्कूल मदारिस में प्रारंभिक शिक्षा मे उस्ताद का किरदार बहुत ही अहमियत का हामिल होता है किसी ने ठीक ही कहा है कि"बाप औलाद को आसमान से ज़मीन पर लाता है मगर उस्ताद उसे ज़मीन से आसमान की बुलंदियों पर पहुंचा देता है।यक़ीनन उस्ताद सही तालीम व तर्बियत से तलबा को ऊँचे व बुलंद मक़ाम पर पहुँचाने मे मददगार हैं।लेकिन यही उस्ताद अगर अपने फ़र्ज़ में कोताही करते हैं तो बच्चे की ज़िन्दगी तबाह व बर्बाद हो सकती है उसकी रहनुमाई तालीम व तर्बियत पर मुनहसिर करती है।
                 प्रारंभिक शिक्षा मे शिक्षकों का किरदार अहम् और काफी अहमियत का हामिल होता है।अच्छे उस्ताद तालबे इलमों की अच्छी तर्बियत करते हैं और उनके खूबियों को मंज़रे आम पर लाते हैं।उस्ताद को अपने फ़र्ज़ मंसबी को ईमानदारी व सच्चाई के साथ पाये तकमील पहुंचानी चाहिए किसी भी नाज़ुक हालात में तंग नज़री का शिकार नही होनी चाहिए क्योंकि फ़र्ज़ से कोताही का असर छात्रों के ज़िन्दगी बर्बाद कर देने का बायस बन जाएगा।बच्चे बड़ो की नक़्ल व तक़लीद करते हैं और अपने उस्ताद को मिसाली समझ कर पैरवी करते हैं उसकी शख्सियत से मुतास्सिर होते हैं।इसलिए उस्ताद की शख्सियत बहुत ही खुबियों की हामिल होनी चाहिए।एक अच्छा उस्ताद एक अच्छे साफ व सुथरे सेहत मंद मुयासरः की तश्किल करता है। जब तलबा अपने उस्ताद की सलाहियत और काम के मुताल्लिक़ वाकिफ हो जाते हैं तो उसकी अज़मत और मर्तबा के गर्विदा हो जाते हैं और अपने लायक़ व फाएक उस्तादों को कभी फ़रामोश नही कर पाते हैं यह नक़्श अनमिट हो जाते हैं यही वजह है कि बच्चे अपने अच्छे उस्तादों को हमेशा याद किया करते हैं।

              आलमी सतह पर भी यह बात मुसम्मम है कि हर दौर में उस्ताद(सिखलाने वालों) की अहमियत रही है और ता क़यामत रहेगी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।दौरान ए इब्तेदाई तालीम हमारे उस्तादों को वसाइल की कमी होती है इस बात से इंकार नही किया जा सकता है वक़्त से शासन प्रशासन की जानिब से दरसी किताबें दस्तयाब नही कराई जाती हैं और हम खामोश तमाशाई बन कर देखते रहते हैं और अपने बच्चों को दूसरी ज़ुबान में शाया किताबों के तवस्त से इब्तेदाई तालीम देना शुरू कर देते हैं जो सरासर ग़लत है हम इस मामला में बेहिस हो जाते हैं और सरकार के ख़िलाफ़ एहतेजाज नही करते "जबकि "आवाज़" जब भी एहतेजाज की दीवार से टकराती है तो गूँज बनकर फैल जाती है लेकिन जब कोई रद्दे अम्ल ही नही होगा तो आवाज़ गूँज बन कर कैसे फैलेगी, अब वक़्त गया----–-कोने में बैठ कर बात करने से बात नहीं बनेगी बल्कि अपनी आवाज़ एकतदार ए हकुमत तक पहुंचानी होगी।

               उर्दू ज़ुबान क़ो किसी मज़हब से जोड़ कर नही देखा जा सकता यह एक सेक्युलर ज़ुबान है।सरकार की यह ज़ेम्मेदारी बनती है कि वह ज़ुबानों की हिफाज़त करें और बच्चों को उनकी मादरी ज़ुबान में तालीम दे उर्दू को ज़ो आइनी दर्जा हासिल है सिर्फ उस से काम नहीं चलेगा अमली एकडेमत करने की ज़रूरत है।जिस तरह ईमारत कि मज़बूती के लिए मज़बूत बुनियाद की ज़रूरत होती है उसी तरह अच्छे और एखलाकी नज़रिये से सेहत मंद मुयासरे की बुनियाद हमारे बच्चे हैं।हर बच्चा नई नस्ल का फर्द होता है और उसकी सही तालीम व तर्बियत हमारे मुयासरे का ढांचा खड़ा रहता है।इसलिए बच्चों की तालीम व तर्बियत और ज़ेहन साजी का काम उस्तादों को सालेह असूलों की बुनियाद पर उस्ताद के साथ साथ वाल्दैन व सरपरस्त और ज़ेम्मेदारों का फ़रीज़ा है।बच्चों का ज़ेहन गीली मिट्टी की तरह होता है उस पर बचपने में जो नकुश सब्त होते हैं वह कभी ज़ाएल नही होते।
         
                    उर्दू अदब की बुनियाद गंगा जमुनी तहजीब पर क़ायम है जो मिल्ली रवादारी ,बाहमी अखुत और शाइस्तगी का दर्स देता है।जब उर्दू में अदब तख़लीक़ हो रहा था तो उस वक़्त मुसलमानों के साथ हिन्दू भी क़लम के जौहर दिखाए आज़ादी के बाद उर्दू ज़ुबान व अदब को मुसलमानों की ज़ुबान क़रार देकर इस सेक्युलर ज़ुबान से पल्ला झाड़ लिया ।उर्दू उस्तादों का फ़र्ज़ है कि बच्चों को मादरी ज़ुबान उर्दू में ही प्ररंभिक तालीम दें।मुसलमानों का ज़यादा तर अदब उर्दू ज़ुबान में ही है इसलिए बच्चों को अखलाक़यात के साथ दीन की भी तालीम हासिल होगी और ज़ुबान के बक़ा और फ़रोग़ का रास्ता भी हमवार होगा दूसरा फायदा ये होगा कि दीनी तर्बियत होने से वह एक अच्छे शहरी बन सकेंगें।बच्चों के साथ मुहब्बत का रवैय्या अख़्तेयर करें उसको यह हौसला दीजिए कि वह हमेशा बहादुरी का मुज़ाहरा करें उसे सिखलाइये कि वह अपनी ज़ात में हमेशा यक़ीन की क़ूवत बरक़रार रखें, बच्चे को हसद से दूर रखें ।
"इस्लाम ने कहा है कि अगर कोई नादारी व आजज़ी के बावजूद सदक़ा का अजर लेना चाहता है वह जो इल्म सीख है वह औरों को सिखलाए तो उसका शुमार सदक़ा देने वालों में होगा।"
              

       

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