Saturday, January 12, 2019

तीसरे मोर्चों को सत्ता में आने की ज़रूरत, मगर अपनी कमजोरी के कारण नही आ पाते- महज़बीं

तीसरे मोर्चों को सत्ता में आने की ज़रूरत, मगर अपनी कमजोरी के कारण नही आ पाते- महज़बीं


तीसरे मोर्चों की कमियों के कारण ही तो, भारत में सिर्फ और सिर्फ कॉग्रेस - बीजेपी राज करती आई है, और करती रहेगी, भारत के तीसरे मोर्चे बहुत कमजोर, बेअक़ल, सुस्त, अहसासे कमतर, मौन व्रत रखने वाले हैं। भाग्य में विश्वास रखते हैं, कर्म में नहीं। जनमत इकट्ठा करने में विफल रहे हैं। सब होता है इनसे, तरह - तरह के आयोजन, सेमिनार, विरोध प्रदर्शन, सिर्फ विश्वविद्यालयों तक सीमित रखते हैं। अपनी आवाज़ के दायरे को बड़ा नहीं करते हैं, जनमत जबतक हासिल नहीं करते, तबतक सब बेक़ार है, और जनमत सिर्फ महानगरों, युनिवर्सिटी कॉलेज के विद्यार्थियों प्रवक्ताओं का नहीं चाहिए होता, वो तो मुट्ठी भर हैं, सत्ता में आने के लिए निम्न, मध्य, उच्च स्तरीय अवाम के जनमत की भी आवश्यकता है, जिसके लिए यूनिवर्सिटीज के सेमीनार हॉल की कुर्सीयों को छोड़कर अवाम के बीच आना होगा, सड़कों, नुक्कड़ों, गांव - गांव, शहर - शहर, छोटे - बड़े कस्बों में, आम आदमी, अनपढ़ आदमी, मज़दूर आदमी, तक अपनी आवाज़ पंहुचना है। आजादी के 65/66 सालों में भी ग़रीब, मज़दूर, मज़लूम कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट नामों से, पार्टियों से इनके विचारों से वाकिफ नहीं हैं ।


विचारों को व्यक्त तो सभी करते हैं। बात तब बनेगी जब यह विचार उन तक पहुंच सकें और लोग इन अच्छे विचारों को जान सकें ।  
कहीं न कहीं अवाम भी जिम्मेदार है तीसरे मोर्चों की नाकामयाबी के लिए। यहां राय बहादुर तो सब हैं। फर्माबरदार कितने हैं? 
हालात  तो सभी बदलना  चाहते हैं। सरकार बदलते नहीं। तीसरी ताकतों को सेन्टर में लाते नहीं। इनके पास दो कुर्ते हैं (कॉंग्रेस, बी. जे. पी )  पहनने को। एक उतारा दूसरा पहन लिया, दूसरा उतारा पहला पहन लिया। कपड़े रोज बदलते हैं। फेसबुक, वटसप प्रोफाइल भी 15 दिन में बदल देतें हैं। एक पिक्चर देखेंगे बस मन भर जाता है। कांग्रेस, बी. जे. पी, से मन नहीं भरा। 
लोग क्यों देते हैं इन दो पार्टियों को वोट।  चुनाव में तीसरी पार्टी के लोग मेहनत करने के बावजूद सफल नहीं हो पाते।
इस नाकामयाबी पर बहुत आत्ममंथन की आवश्यकता है, तीसरी पार्टी के लोगों को और मेहनत करनी है। परम्परागत बने बनाए ढाँचे को तोड़ना होगा।  अपनी पार्टी के बारे में अवेयरनेस फैलानी पड़ेगी, टीवी, रेडियो, इंटरनेट, नुक्कड़ नाटक। के द्वारा। और उनके बीच जाना होगा। 


तीसरे मोर्चे की पार्टियों, विचारों से सिर्फ साहित्य, इतिहास, राजनीति विज्ञान के अध्यापक और क्षात्र क्षात्राएं ही अच्छी तरह से वाकिफ हैं। लेकिन अफसोस अब शिक्षा भी प्रोफेशनल होती जा रही है। क्योंकि लेंग्वेज, हिमेनुटी की पढ़ाई में रोजी- रोटी नहीं। और ये इंसान की बुनियादी ज़रूरत है। इसलिए सब प्रफेशनल   शिक्षा की ओर बढ़ रहे हैं। यानी आगे आने वाली पीढ़ी  इन विचारों,पार्टियों से बिल्कुल ही अपरिचित रहेगी। 
अगर हिन्दुस्तान की राजनीति में बदलाव लाना है, समाज में बदलाव लाना है। तो इन तीसरी ताकतों को भी केजरीवाल, आंगनबाड़ी, की तरह लोगों के बीच में रहकर काम करने की ज़रूरत है।और हक़ीक़त भी यही है कि, आम आदमी, ग़रीब, मज़दूर के  बिना सत्ता में कोई भी नहीं आ सकता है। 


ग़रीब अनपढ़ लोगों के तीसरे मोर्चों से नावाकिफ़ होने के कारण, कम्युनिस्ट- सोशलिस्ट विचार, युनिवर्सिटी, कुछ पत्रिकाओं, अख़बारों में ऊपर - ऊपर तैरते रहते हैं , निचे तह तक तो जाते ही नहीं है। और कामयाबी के लिए निचले स्तर पर, सतह पर आना ही होगा। और यही अबतक नहीं हुआ। तैरने के साथ - साथ चलने की भी ज़रूरत है। बुद्धिजीवियों को समझना चाहिए। अब नहीं समझ रहे हो तो, कौनसे वक्त में समझोगे? यह भी सत्य है कि आज की तारीख़ में, सोशल नेटवर्किंग और सोशल मीडिया के बग़ैर जनमत नहीं इकट्ठा किया जा सकता है लेकिन, फिर भी बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो अनपढ़ हैं, उनतक अपनी आवाज़, विचारों को पंहुचने के लिए, सोशल मीडिया और युनिवर्सिटी से बाहर आईये, बहुत कुछ बाहर ही है। लेख, कविता पर टिप्पणी, पुरस्कार, तालियां बटोरने से ज्यादा ज़रूरी, जनमत बटोरने की ज़रूरत है,  उदाहरण के तौर पर, पोलियो की दँवाई पिलाने वालों की तरह, हर एक घर के दरवाज़े तक जाने की ज़रूरत है, सिर्फ अस्पताल में दँवाई पिलाने से पोलियो कंट्रोल नहीं हुआ है। पोलियो अभियान के सेवाकर्मी की तरह काम करने की ज़रूरत है, तीसरे मोर्चों को। साठ साल हो गए भारत की आवाम के सामने, दो ही बड़े विकल्प हैं, सियासी पार्टी के नाम पर, कॉग्रेस - बीजेपी, जनता भी मज़बूरी में इन्हीं दो विकल्पों को पक्ष- विपक्ष के लिए चुनती रहती है। करोड़ों अरबों वोटर अनपढ़ हैं, ग़रीब मज़दूर वर्ग से हैं, उनके दिल - दिमाग़, सूझबूझ में समाईये, 


तीसरी ताकत के बुद्धिजीवी... अपनी भाषा को सरल आम बोलचाल में... कहें प्रतीक बिंबो के प्रयोग के बिना... क्योंकि इस तरह की भाषा में मेसिज सिमित रहता है। वोटरों के ऊपर से जाता है। ज़रा राष्ट्रीय उर्दू सहारा, जनसत्ता की  भाषा पर ध्यान दें। वो हर तबके के आदमी तक नहीं पहुंच पाती। और वोट हर इंसान का कीमती होता है। विज्ञापन वालों से सीखे कैसे अपनी बात को हर ग्राहकों तक पहुंचाते हैं। भाषा ही एक मात्र सबसे बड़ा साधन है, जनमत इकट्ठा करने के लिए।और ग़रीब, आम आदमी के  सामने विकल्प के तौर पर पेश तो होइये, तभी तो वो वोट देंगे ।


मेहजबीं


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