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Tuesday, March 05, 2019

कमज़ोर आर्थिक स्थिति के कारण शिक्षा से वंचित होते नौजवान

सीतामढ़ी: कमज़ोर आर्थिक स्थिति के कारण शिक्षा से वंचित होते नौजवान

पिछले माह 23 फरवरी से लेकर 28 फरवरी तक राष्ट्र सेवा दल, सेवक फाउंडेशन और सद्भावना संगम की एक टीम ज़िला के बाजपट्टी, नानपुर, बोखरा, पुपरी, परिहार और सोनबरसा के विभिन्न गांव और पंचायतों का 'सद्भावना, शिक्षा और रोज़गार' के मुद्दे पर भ्रमण कर रही थी। जिसका हिस्सा मैं भी था। शिक्षा और रोज़गार पर सरकार की स्थिति और नीतियों से कम और ज़्यादा राज्य का हर ब्यक्ति अवगत है। लेकिन बिहार का यह जिला शैक्षणिक रूप से और ज़िलों की तुलना में कुछ ज़्यादा ही कमज़ोर है। सरकारी संस्थान की गुणवत्ता पर बिहार सरकार खुद मान चुकी है कि पाँचवी क्लास का बच्चा दूसरी क्लास के गणित का हल नहीं कर सकता। इसकी चपेट में इंटर और स्नातक के छात्र भी उतने ही हैं जितने मिडिल और प्राइमरी स्कूल के बच्चे। कारण अनेक है जिसकी चर्चा और निवारण पर विस्तार से की जानी चाहिए।

इस यात्रा के दौरान बहुत से छात्र ऐसे मिले जिनके अंदर काबिलियत कूट कूट कर भरी थी लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण वो अपनी शिक्षा को आगे तक नहीं ले जा सकते। उनमें से कई खुद ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई कर रहे हैं। कुछ इस बात पर चिंतित हैं कि आगे की पढ़ाई कैसे होगी?

आज जब हमारा समाज जुलूस-जलसों और मुशायरों पर लाखों रुपया फूंक दे रहा है ऐसे में समाज के इन होनहार छात्रों पर हमारी नज़र क्यों नहीं जाती? हम जितनी आसानी और रुचि से मज़हबी जलसों के लिए चंदा इकट्ठा करने के लिए निकलते हैं हमारे ख्याल में ऐसा क्यों नहीं आता कि हम इन बच्चों की शिक्षा के लिए भी ऐसे ही समाज के अंदर एक मुहिम चलाएं और आपसी सहयोग से इनकी पढ़ाई का खर्च इकट्ठा करें? क्या इन छात्रों की शिक्षा की जगह मज़हबी जलसों के नाम पर होने वाले चंदे ज़्यादा अहमियत रखते हैं? और क्या जो लोग इन जलसों और मुशायरों के लिए दिल खोलकर चंदा देते हैं उन्हें समाज के इन कमज़ोर तबक़ों की असलियत और ज़िम्मेदारी पता नहीं? सामाजिक और आर्थिक पसमांदा समाज के इन छात्रों से क्या हमारा कोई सरोकार नहीं?

कोई ये सारे सवालात मुझसे भी कर सकता है। मैं स्वयं को भी इतना ही दोषी मानता हूं जितना दोष मैं समाज के दूसरे लोगों पर मढ़ रहा हूँ। लेकिन मुझमें और समाज के दूसरे लोगों में ये फ़र्क़ ज़रूर समझता हूं कि खुद पर और आप पर सवाल उठाने की हिम्मत भी मैंने ही कि है। क्या समाज के दूसरे लोग भी इस सवाल को इतने ही ज़ोर से उठाने ही हिम्मत और हौसला रखते हैं? अगर हां तो सबसे पहले इन जुलूस, जलसों और मुशायरे बाजों से सवाल कीजिये कि आखिर ये समाज को देने क्या जा रहा है? किसी सरकारी प्रायोजित ' सियासी और तरबियती' प्रोग्राम पर समाज लाखों और करोड़ों क्यों खर्च करे जबकि समाज का नौजवान एक तरफ आर्थिक कमज़ोरी से अशिक्षित और बेरोज़गार हो रहा है।

मज़हब हमें शिक्षित होना सिखाता है, न्याय के लिए आवाज़ उठाने की बात करता है, आपसी बराबरी और भाईचारे की बात करता है, ग़रीब और मजबूरों के लिए खड़े होने की बात करता है। लेकिन क्या सच में हम ऐसा कर पा रहे हैं?

मेरा सवाल उन इदारों के ज़िम्मेदारों से भी है जो पूरे मुस्लिम समाज को अपनी छुपी सियासी मफ़ादात की खातिर साल भर इन जलसों में उलझाकर रखे हुए हैं। क्यों करोड़ों का ये बोझ आप लोग समाज पर डालते हैं? क्या मुस्लिम समाज की समस्यायों का हल ये जलसे हैं? आप क्यों नहीं सरकारों के विरोध में शिक्षा सुधार के लिए उतरते, आप क्यों नहीं राज्य के नौजवानों के रोज़गार दिलाने की तहरीक चलाते? अगर आप ये नहीं कर सकते तो मैं आपके इस जलसे का बॉयकॉट करता हूँ। मेरे जैसे युवा के लिए इस समाज में शिक्षा और रोज़गार ज़्यादा अहम हैं ये मज़हबी जलसे नहीं।

इस राज्य का अभिशाप अशिक्षा, बेरोज़गारी और साम्प्रदायिकता है। जो मज़हबी जलसों से नहीं मिटने वाला। युवा अपना फैसला खुद करें की उनका फायदा धर्म के नाम पर एक भीड़ बनने में है या अपने अधिकार के लिए सरकारों के समक्ष सवाल रखने में।

इंकेलाब, ज़िंदाबाद।।

तनवीर आलम
प्रेसिडेंट
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एलुमनाई एसोसिएशन ऑफ महाराष्ट्र।
मोब- +91-9004955775
दिनांक: 5 मार्च 2019
सीतामढ़ी

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