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Friday, May 17, 2019

मौलाना मंज़ूर अहसन अजाज़ी :- जंग ए आज़ादी का एक अज़ीम रहनुमा


मौलाना मंज़ूर अहसन अजाज़ी :- जंग ए आज़ादी का एक अज़ीम रहनुमा

मौलाना मंज़ुर अहसन अजाज़ी हिन्दुस्तान के उन चुनिंदा लोगों में से हैं जिन्होने ना सिर्फ़ मुल्क की आज़ादी के लिए जद्दोजेहद किया बल्के मुल्क के आज़ाद हो जाने के बाद भी बहुत बड़ी क़ुर्बानीयां दीं।

ज़िला मुज़फ़्फ़रपुर बिहार के शकारा थाना के डिहुली में 1898 में पैदा हुए मंज़ुर अहसन अजाज़ी के वालिद का नाम मौलवी हफ़ीज़उद्दीन हुसैन और वलिदा का बीबी महफ़ुज़उन्नीसां था, दादा हाजी इमाम बख़्श एक ज़मीनदार थे, और नाना रेयासत हुसैन सीतामढ़ी के एक क़द्दावर वकील थे।

इबतदाई तालीम जिसमे मज़हब की तालीम भी है घर पर ही हुई, फिर मदरसा ए इमदादिया दरभंगा से तालीम हासिल की, फिर मौलाना मंज़ुर अहसन अजाज़ी नार्थ ब्रुक ज़िला स्कुल दरभंगा मे दाख़िला लिया जहां से उन्हे अंग्रेज़ों का विरोध करने के वजह कर छोटे भाई मग़फ़ुर अहमद अजाज़ी के साथ स्कुल से निकाल दिया गया, ये 1913 का दौर था जब महज़ 15 साल की उम्र में इऩ्होने अंग्रेज़ मुख़ालिफ़ तहरीक में हिस्सा लिया।

मौलाना मंज़ुर अहसन अजाज़ी ने क़ौमप्रस्ती अपने वालिद हफ़ीज़ हुसैन से सीखी जो एक तरफ़ क़द्दावर ज़मींनदार थे तो दुसरी जानिब कट्टर अंग्रेज़ मुख़ालिफ़.. अपने लोंगो की हर तरह से हिफ़ाज़त वो अंग्रेज़ो से करते थे जिस वजह कर अपने अवाम मे बहुत ही मक़बुल थे।

1917 में गांधी की तहरीक से जुड़ने चम्पारण गए और साथ ही रौलेट एैक्ट के विरोध में आगे आगे रहे।

1919 में ख़िलाफ़त तहरीक के समर्थन में पुसा शुगरकेन रिसर्च इंस्टिचुट की जमी जमाई नौकरी छोड़ दी और खुल कर तहरीक ए आज़ादी में हिस्सा लेने लगे, इसी दौरान अजाज़ी साहेब अली बेरादरान के नज़दीक आए और इनके साथ मौलाना आज़ाद सुबहानी, अब्दुल मजीद दरयाबादी जैसे क़़द्दावर नेताओं से भी उनके तालुक़ात अच्छे हो गए।

1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में हिस्सा लिया जिसमें ख़िलाफ़त और असहयोग तहरीक के समर्थन में रिज़ुलुशन पास हुआ।

1920 में ही ऑल इंडिया ख़िलाफ़त कमिटी के स्क्रेट्री चुने गए और 1924 तक इस पद पर रहे,वोह मरक़ज़ी ख़िलाफ़त कमिटी के अहम स्तुन थे, अली बेराद्रान के साथ मिल कर ख़िलाफ़त कमिटी के क़याम मे नुमाया किरदार अदा किया।

1921 के दिसम्बर में पहली बार करांची ट्रायल के तहत जब अली बेराद्रान (शौकत अली और मुहम्मद अली), जगत गुरन शंकराचार्य वग़ैरा गिरफ़्तार हुए तो मौलाना मंज़ुर अहसन अजाज़ी बिहार के पहले कांग्रेसी थे जिन्हे इस धारा के तहत गिरफ़्तार किया गया, इस दौरान वो बक्सर, मुज़फ़्फ़रपुर, हज़ारीबाग़ सहीत कई जेलों में कई माह क़ैद रहे।

1922 में जेल से छुटते ही दिसम्बर में कांग्रेस के गया अधिवेशन में हिस्सा लेने जा पहुंचे, रेलवे स्टेशन पर ख़ुद गांधी जी और शौकत अली उनके स्वागत को पहुंचे थे।

1923 में बिहार प्रादेश कांग्रेस कमिटी के जवाईंट स्क्रेट्री चुने गए और इसी साल इन्होने पुर्णिया में बिहार पॉलिटिकल कांफ़्रेंस का आयोजन किया।

1930 में खुल कर नमक सत्याग्रह में हिस्सा लेने की वजह कर इन पर बंदिश लगा दी गई और गिरफ़्तार कर लिये गए, तक़रीबन 8 माह क़ैद रहे।

1940 में अपने छोटे भाई मग़फुर अहमद अजाज़ी की तरह मुस्लिम लीग की लाहौर रिज़्युलुशन का खुला विरोध किया।

1941 में 30 नवम्बर को आम जन के समर्थन में ख़ुद ही एक सत्याग्रह की क़यादत मुज़फ़्फ़रपुर में की, जिसकी वजह आप गिरफ़्तार कर लिये गए।

1942 में मुज़फ़्फ़रपुर लोकल बोर्ड के चेयरमैन चुने गए।

1942 में मुम्बई के उस इजिलास मे मौजुद थे जिसमें गांधी जी की क़यादत में युसुफ़ जाफ़र मेहर अली ने “अंग्रेज़ो भारत छोड़ो” का मारा दिया और अगस्त की क्रातिं शुरु हुई।

1942 के भारत छोड़ो तहरीक में आगे आगे रहे और पुरे बिहार का दौरा किया और अगस्त की क्रातिं को आम जन तक पहुंचाया, इसके बाद एक बार फिर गिरफ़्तार कर जेल भेज दिये गए, जहां ये चार सालो तक क़ैद रहे।

1947 में मुस्लिम लीग के उम्मीदवार के ख़िलाफ़ कांग्रेस के उम्मीदवार की हैसियत से पहली बिहार पॉलिटिकल सफ़र्र कॉन्फ़्रंस के चेयरमैन पंडित नेहरु की सदारत में चुने गए।

अलीपुर, अागरा क़िला जेल, बक्सर, मुज़फ़्फ़रपुर, गया, बांकीपुर, हज़ारीबाग़, मोतिहारी कैम्प जेल सहीत हिन्दुस्तान की कई जेलों में अपनी ज़िन्दगी के 13 साल गुज़ार दिये।

1957 में फ़तेहपुर बिहार से कांग्रेस के टिकच पर विधायक चुने गए और ये वो सीट थी जहां से कांग्रेस पहले कभी कामयाब नही हुई थी, 1962 तर इस पद पर बने रहे, और अवाम की भरपुर सेवा की और यहां तक कि अवाम की ख़ातिर अपने जानशीं को क़ुर्बान कर डाला पर कभी हिम्मत नही हारी, हमेशा मज़लुमों का साथ दिया और ज़ालिमों का मुक़ाबला किया।

17 मई 1969 को ये मर्द ए मुजाहिद 72 साल की उम्र में पटना में इंतक़ाल कर गया, जिनकी नमाज़ ए जनाज़ा अंजुमन इस्लामिया हॉल पटना में हुई और पीर मुहानी क़ब्रिस्तान में दफ़न कर दिया गया।

Md Umar Ashraf

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